जयपुर। राजस्थान में खाद की टैगिंग को लेकर सरकार के दावों और किसान संगठनों की शिकायतों के बीच विरोधाभास सामने आया है। कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा का कहना है कि किसानों को नैनो यूरिया या नैनो डीएपी खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। वहीं, किसान संगठनों का आरोप है कि डीएपी के साथ नैनो खाद की किट लेने का दबाव अब भी बना हुआ है। इस विवाद के बीच सरकार ने प्रदेश में खाद के स्टॉक और कालाबाजारी के खिलाफ की गई कार्रवाई के आंकड़े भी जारी किए हैं।
18 दिन का डीएपी और 35 दिन का यूरिया स्टॉक
कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा के मुताबिक, राजस्थान में फिलहाल 1.05 लाख मीट्रिक टन डीएपी और 3.63 लाख मीट्रिक टन यूरिया उपलब्ध है। मौजूदा खपत के हिसाब से यह स्टॉक करीब 18 दिन की डीएपी और 35 दिन की यूरिया की जरूरत पूरी कर सकता है। इसके अलावा लगभग 35 हजार मीट्रिक टन डीएपी की खेप रास्ते में है, जिसके 14 अक्टूबर तक किसानों के लिए उपलब्ध होने की उम्मीद है।
मंत्री ने बताया कि खरीफ सीजन 2026 में डीएपी की 5.10 लाख मीट्रिक टन मांग के मुकाबले 5.45 लाख मीट्रिक टन खाद उपलब्ध कराई गई। वहीं, यूरिया की 11 लाख मीट्रिक टन मांग के मुकाबले 17.15 लाख मीट्रिक टन से अधिक खाद उपलब्ध कराए जाने का दावा किया गया है।
11,770 दुकानों का निरीक्षण, 128 फर्मों पर कार्रवाई
खाद की कालाबाजारी, जमाखोरी और अनियमितताओं पर कार्रवाई का ब्योरा देते हुए कृषि मंत्री ने बताया कि अब तक 11,770 उर्वरक विक्रेताओं का निरीक्षण किया गया और 9,585 नमूने लिए गए। अनियमितताएं मिलने पर 1,238 कारण बताओ नोटिस जारी किए गए। इसके अलावा 64 विक्रेताओं की बिक्री पर रोक लगाई गई, जबकि 128 फर्मों के प्राधिकार पत्र निलंबित या निरस्त किए गए।
मंत्री के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में अब तक 25 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है और 11 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। खाद वितरण में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए विभागीय कर्मचारियों की मौजूदगी में बिक्री और वितरण की निगरानी की जा रही है। सभी जिलों में नियंत्रण कक्ष भी बनाए गए हैं।
नैनो खाद की टैगिंग पर किसान संगठनों के सवाल
कृषि मंत्री ने स्पष्ट किया है कि नैनो यूरिया और नैनो डीएपी खरीदना किसानों की इच्छा पर निर्भर है। उन्हें इन्हें खरीदने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। हालांकि, किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट का आरोप है कि लाइसेंसी विक्रेताओं को इफको से डीएपी के साथ नैनो खाद की किट दी जा रही है। उनका दावा है कि विक्रेताओं पर यह किट लेने का दबाव है और इसका असर किसानों पर भी पड़ रहा है।
किसान संगठनों का कहना है कि यदि किसानों को बिना नैनो खाद खरीदे डीएपी नहीं मिलती, तो टैगिंग रोकने के सरकारी निर्देशों का क्या फायदा है? उनका तर्क है कि खाद के पर्याप्त भंडार का दावा तभी किसानों के लिए मायने रखता है, जब जरूरत के समय उन्हें अपनी पसंद की खाद आसानी से मिल सके।
ऐसे में राजस्थान में खाद की उपलब्धता के साथ-साथ वितरण व्यवस्था की वास्तविक स्थिति भी अहम हो गई है। अब निगाह इस बात पर है कि सरकार के निर्देशों का जमीनी स्तर पर कितना पालन होता है और किसानों को डीएपी बिना किसी अतिरिक्त खरीद के मिल पाती है या नहीं।