अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से तेल आयात करने वाले देशों की चिंता बढ़ गई है। ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है, जबकि अमेरिकी बेंचमार्क WTI भी 98 डॉलर के आसपास कारोबार कर रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ता सैन्य तनाव, समुद्री रास्तों पर जहाजों की सुरक्षा को लेकर खतरा और परिवहन लागत में इजाफा तेल बाजार को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे हालात में सप्लाई बाधित होने की आशंका के कारण कीमतों में जोखिम प्रीमियम भी बढ़ रहा है।
सऊदी अरब के एयरपोर्ट पर हमले से बढ़ी चिंता
सऊदी अरब के दम्माम स्थित किंग फहद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हमले की खबर ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। दी गई जानकारी के मुताबिक, बुधवार शाम हुई घटना में एक व्यक्ति की मौत हुई और आठ लोग घायल हुए। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब पश्चिम एशिया में तनाव पहले से ही तेल कारोबारियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
हालांकि, इस हमले के कारण तेल उत्पादन या निर्यात पर सीधे असर की पुष्टि नहीं हुई है। बाजार की चिंता मुख्य रूप से इस आशंका से जुड़ी है कि यदि तनाव तेल उत्पादन केंद्रों या निर्यात के बुनियादी ढांचे तक पहुंचता है, तो वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर टिकी दुनिया की नजर
कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज यानी होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा है। यह महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग खाड़ी क्षेत्र के तेल उत्पादकों को वैश्विक बाजारों से जोड़ता है। यहां जहाजों पर हमलों और समुद्री बारूदी सुरंगों के खतरे से तेल की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है।
सुरक्षा जोखिम बढ़ने पर शिपिंग कंपनियों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने, अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था करने और माल पहुंचाने में अधिक समय लगाने की जरूरत पड़ सकती है। इससे परिवहन महंगा होता है और तेल की अंतिम लागत बढ़ सकती है।
युद्ध बीमा महंगा, टैंकरों की लागत बढ़ी
पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण तेल टैंकरों के लिए युद्ध जोखिम बीमा भी महंगा होने की बात सामने आई है। जोखिम वाले समुद्री क्षेत्रों से गुजरने वाले जहाजों पर बीमा कंपनियां अधिक प्रीमियम लगा सकती हैं। यदि बीमा लागत और ढुलाई खर्च में तेज बढ़ोतरी होती है, तो इसका असर तेल कारोबार की लागत पर पड़ सकता है।
इसके साथ ही, संभावित हमलों और सप्लाई में रुकावट की आशंका कारोबारी कीमतों में अतिरिक्त जोखिम जोड़ती है। इसी को जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम कहा जाता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिकी भंडार भी अहम
तेल बाजार पर रूस-यूक्रेन युद्ध का असर भी बना हुआ है। रूसी रिफाइनरियों पर ड्रोन हमलों से पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ सकती है। रिफाइनिंग क्षमता प्रभावित होने पर तैयार ईंधन की सप्लाई पर दबाव पड़ने की आशंका रहती है।
दूसरी ओर, अमेरिका में कच्चे तेल के कारोबारी भंडार में एक सप्ताह के दौरान करीब 30.6 लाख बैरल की कमी आने की जानकारी भी कीमतों को सहारा देने वाला कारक है। हालांकि, भंडार में बदलाव का असर मांग, उत्पादन और आयात के आंकड़ों के साथ समझना जरूरी है।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहने पर देश के आयात बिल और व्यापार संतुलन पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर महंगाई, परिवहन लागत और उद्योगों के खर्च पर भी पड़ने की आशंका रहती है।
फिलहाल तेल बाजार की दिशा पश्चिम एशिया के घटनाक्रम, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, अमेरिकी भंडार और रूस से जुड़ी सप्लाई की स्थिति पर निर्भर करेगी। यदि तनाव बढ़ता है और आपूर्ति बाधित होती है, तो कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।