Geopolitics: वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा बाजार की अनिश्चितताओं के बीच भारत ने अपनी विदेश और ऊर्जा नीति को लेकर एक बार फिर स्पष्ट रुख सामने रखा है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दो टूक कहा है कि भारत अपने फैसले किसी बाहरी दबाव में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर लेता है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस से तेल आयात को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार चर्चा और दबाव की खबरें सामने आ रही हैं।
म्यूनिख मंच से रणनीतिक स्वायत्तता का संदेश
जर्मनी में आयोजित म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन को संबोधित करते हुए जयशंकर ने कहा कि रणनीतिक स्वायत्तता भारत की विदेश नीति का स्थायी और ऐतिहासिक तत्व है। भारत की नीति-निर्माण प्रक्रिया हमेशा स्वतंत्र सोच और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर आधारित रही है और यह दृष्टिकोण राजनीतिक दलों से परे एक साझा राष्ट्रीय सहमति का हिस्सा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत किसी भी वैश्विक शक्ति संतुलन या दबाव की राजनीति के आधार पर निर्णय नहीं लेता। बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच भारत अपने हितों का आकलन करता है और उसी के अनुरूप विकल्प चुनता है। यह संदेश भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की निरंतरता को दर्शाता है।
जटिल ऊर्जा बाजार में व्यावसायिक फैसलों पर जोर
रूस से तेल आयात को लेकर उठे सवालों के जवाब में जयशंकर ने कहा कि आज का वैश्विक ऊर्जा बाजार अत्यंत जटिल हो चुका है। तेल की कीमत, उपलब्धता, आपूर्ति जोखिम और भू-राजनीतिक परिस्थितियां—इन सभी कारकों को ध्यान में रखकर कंपनियां निर्णय लेती हैं। भारत की तेल कंपनियां भी अन्य देशों की कंपनियों की तरह व्यावसायिक आधार पर आयात के निर्णय करती हैं।
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां लगातार बदल रही हैं और ऐसे में सभी देश अपनी ऊर्जा रणनीतियों की समीक्षा कर रहे हैं। भारत भी अपने दीर्घकालिक हितों और स्थिर आपूर्ति को ध्यान में रखते हुए विभिन्न विकल्पों का मूल्यांकन करता रहता है। यह दृष्टिकोण भारत की ऊर्जा नीति को व्यावहारिक और संतुलित बनाता है।
रूस से तेल आयात पर संतुलन की नीति
भारत की ऊर्जा नीति का मूल उद्देश्य देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है। 1.4 अरब की आबादी वाले देश की जरूरतों को देखते हुए भारत विभिन्न स्रोतों से तेल आयात कर रहा है। रूस वर्तमान में भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है, हालांकि पिछले वर्ष के उच्च स्तर की तुलना में उसकी हिस्सेदारी कुछ कम हुई है और यह लगभग 27 से 35 प्रतिशत के बीच बताई जा रही है।
हाल के महीनों में यह चर्चा तेज हुई थी कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक व्यापार समझौते के तहत रूसी तेल खरीद रोकने का आश्वासन दिया है। हालांकि भारत के विदेश मंत्रालय ने इस दावे की पुष्टि या खंडन नहीं किया और स्पष्ट किया कि भारत की प्राथमिकता ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण और स्थिर आपूर्ति है, न कि किसी एक देश पर निर्भरता।
रूस की प्रतिक्रिया और कूटनीतिक संतुलन
इस मुद्दे पर रूस की ओर से भी संतुलित प्रतिक्रिया आई है। रूस के विदेश मंत्री Sergey Lavrov सहित कई अधिकारियों ने कहा कि उन्हें भारत की ओर से तेल खरीद रोकने संबंधी कोई औपचारिक सूचना नहीं मिली है। उन्होंने भारत को एक विश्वसनीय और दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार बताया। म्यूनिख सम्मेलन के दौरान जयशंकर ने जी7 देशों के विदेश मंत्रियों सहित कई वैश्विक नेताओं से भी मुलाकात की। इन बैठकों में वैश्विक सुरक्षा, बहुपक्षीय सहयोग और संयुक्त राष्ट्र सुधार जैसे मुद्दों पर भारत का दृष्टिकोण साझा किया गया। यह भारत की बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।
राष्ट्रीय हित और कूटनीतिक संतुलन का मॉडल
पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखने की नीति पर चल रहा है। भारत न तो किसी दबाव में निर्णय लेने के संकेत दे रहा है और न ही अपने दीर्घकालिक रणनीतिक हितों से समझौता करने की स्थिति में है। जयशंकर के बयान से यह संदेश जाता है कि वैश्विक समीकरण चाहे जैसे बदलें, भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को विदेश नीति की आधारशिला बनाए रखेगा। ऊर्जा सुरक्षा, बहुपक्षीय साझेदारी और स्वतंत्र निर्णय क्षमता—ये तीनों भारत की वर्तमान कूटनीतिक रणनीति के प्रमुख स्तंभ बने हुए हैं।
बदलती दुनिया में भारत की स्वतंत्र विदेश नीति
विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन और ऊर्जा राजनीति के दौर में भारत का यह रुख उसकी बढ़ती वैश्विक भूमिका को भी दर्शाता है। भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक निर्णयों में प्रभावी भूमिका निभाने वाला देश बन चुका है। जयशंकर के ताजा बयान इस बात का संकेत हैं कि भारत आने वाले समय में भी “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर कायम रहेगा—जहां राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होंगे और विदेश तथा ऊर्जा नीति स्वतंत्र रूप से निर्धारित की जाएगी।