भारत का कपड़ा उद्योग देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र से करोड़ों लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। लेकिन कपड़ा उद्योग की पूरी श्रृंखला जिस कच्चे माल पर निर्भर करती है, उसकी शुरुआत खेत से होती है और वह है कपास। अब भारत में कपास की कम उत्पादकता और उन्नत बीजों की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ रही है।
बीज उद्योग से जुड़े संगठन फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया ने सरकार से बीजी-2-आरआरएफ कपास बीजों को जल्द मंजूरी देने की मांग की है। संगठन का तर्क है कि नई तकनीक से कपास की उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
बड़ा रकबा, लेकिन उत्पादन कम
भारत दुनिया के प्रमुख कपास उत्पादक देशों में शामिल है। देश में कपास की खेती का क्षेत्र काफी बड़ा है, लेकिन प्रति हेक्टेयर उत्पादन के मामले में भारत कई देशों से पीछे है।
बीज उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में कपास की खेती वाले क्षेत्र का हिस्सा वैश्विक स्तर पर काफी बड़ा है, लेकिन दुनिया के कुल कपास उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी उसके अनुपात में कम है। इसका एक प्रमुख कारण कम उत्पादकता माना जाता है।
बताया जाता है कि ऑस्ट्रेलिया में प्रति हेक्टेयर कपास से मिलने वाली रुई की मात्रा भारत की तुलना में कई गुना अधिक है। चीन और पाकिस्तान जैसे देशों की उत्पादकता भी भारत से बेहतर बताई जाती है। ऐसे में भारतीय किसानों की प्रति हेक्टेयर पैदावार बढ़ाना बड़ी चुनौती है।
अवैध बीजों का बढ़ता इस्तेमाल
इस बीच कपास की खेती में हर्बिसाइड सहनशील बीटी कपास यानी एचटीबीटी बीजों के कथित अवैध इस्तेमाल को लेकर भी चर्चा तेज है।
बीज उद्योग से जुड़े संगठनों और एक अध्ययन के अनुसार, महाराष्ट्र समेत कुछ प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों में किसान ऐसे बीजों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिन्हें भारत में व्यावसायिक खेती के लिए मंजूरी नहीं मिली है।
दावे के मुताबिक, खरीफ वर्ष 2025-26 में देश के कपास क्षेत्र के एक बड़े हिस्से में इस तरह की खेती की गई। इन बीजों का अनधिकृत कारोबार भी बड़े स्तर पर होने की बात कही गई है।
किसान क्यों अपना रहे हैं ऐसे बीज?
एचटीबीटी कपास को लेकर किसानों के बीच आकर्षण की एक बड़ी वजह खरपतवार नियंत्रण से जुड़ी बताई जाती है। इस तकनीक में ऐसी विशेषता होती है, जिससे कुछ खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
किसानों के लिए इसका मतलब खेत में खरपतवार प्रबंधन पर लगने वाली मेहनत और लागत को कम करना हो सकता है। हालांकि, बिना सरकारी मंजूरी वाले बीजों का इस्तेमाल कई तरह के जोखिम भी पैदा करता है। बीज की गुणवत्ता, फसल की विश्वसनीयता और नियामकीय सुरक्षा जैसे सवाल इसके साथ जुड़े हैं।
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
एक तरफ किसान बेहतर पैदावार और कम लागत वाली तकनीक चाहते हैं, वहीं दूसरी तरफ नई जैव-तकनीक वाली फसलों को मंजूरी देने से पहले वैज्ञानिक परीक्षण और पर्यावरणीय सुरक्षा का आकलन जरूरी है।
भारत में कपास की उत्पादकता बढ़ाने के लिए केवल नए बीज पर्याप्त नहीं होंगे। बेहतर सिंचाई, उन्नत कृषि तकनीक, कीट नियंत्रण, गुणवत्तापूर्ण बीज और किसानों को सही जानकारी भी जरूरी है।
कपास की पैदावार बढ़ने से इसका फायदा केवल किसान तक सीमित नहीं रहेगा। इससे देश के कताई, बुनाई, कपड़ा निर्माण और निर्यात उद्योग को भी पर्याप्त कच्चा माल मिलेगा। इसलिए आने वाले समय में कपास की उत्पादकता बढ़ाना कृषि के साथ-साथ भारत के पूरे कपड़ा उद्योग के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।