ग्रामीण भारत में खेती, छोटा कारोबार, बच्चों की पढ़ाई और इलाज जैसी जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी संख्या में परिवार कर्ज लेते हैं। जरूरत के समय कर्ज आर्थिक सहारा बनता है, लेकिन इसकी शर्तों की सही जानकारी नहीं होने पर यही कर्ज परेशानी का कारण भी बन सकता है। कई लोगों को यह पता नहीं होता कि उन्हें कितनी ब्याज दर चुकानी होगी, हर महीने कितनी किस्त देनी है और पूरी अवधि में कुल कितना पैसा लौटाना पड़ेगा। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय और कर्ज संबंधी जागरूकता बढ़ाना जरूरी हो गया है।
सिर्फ कर्ज नहीं, उसकी शर्तें समझना भी जरूरी
ग्रामीण परिवारों की आमदनी अक्सर नियमित नहीं होती। किसानों को फसल बेचने के बाद पैसा मिलता है, जबकि छोटे दुकानदारों की कमाई कारोबार की स्थिति पर निर्भर करती है। ऐसे में अपनी आय और खर्च का हिसाब लगाए बिना कर्ज लेना आगे चलकर मुश्किल पैदा कर सकता है।
PayMe के फाउंडर और CEO महेश शुक्ला के मुताबिक, कर्ज लेने से पहले ब्याज दर, भुगतान की अवधि, मासिक किस्त और क्रेडिट स्कोर की जानकारी होना जरूरी है। इससे व्यक्ति अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार कर्ज की रकम तय कर सकता है। केवल कर्ज उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि लोगों को उसके सही इस्तेमाल और समय पर भुगतान के बारे में भी समझाना चाहिए।
छोटी गलतियां बढ़ा सकती हैं आर्थिक परेशानी
कई बार लोग केवल मिलने वाली कर्ज की रकम और मासिक किस्त देखकर फैसला कर लेते हैं। वे प्रोसेसिंग फीस, देरी से भुगतान पर लगने वाले जुर्माने और अन्य शुल्कों पर ध्यान नहीं देते। इससे कर्ज की वास्तविक लागत बढ़ जाती है।
सेव सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड (सेव ग्रुप) के सह-संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक अजीत कुमार सिंह के अनुसार, कर्ज लेने वाले व्यक्ति को ब्याज और अन्य शुल्क जोड़कर यह समझना चाहिए कि अंत में उसे कुल कितनी रकम लौटानी होगी। भुगतान में लगातार देरी होने पर पुराने कर्ज को चुकाने के लिए नया कर्ज लेने की नौबत भी आ सकती है।
क्रेडिट स्कोर का रखें ध्यान
कर्ज लेने और चुकाने के रिकॉर्ड से क्रेडिट स्कोर तैयार होता है। समय पर किस्त जमा करने से अच्छा क्रेडिट रिकॉर्ड बनाने में मदद मिलती है। इसके विपरीत, लगातार भुगतान में देरी होने से क्रेडिट स्कोर प्रभावित हो सकता है। इसका असर भविष्य में बैंक और वित्तीय संस्थानों से कर्ज मिलने की संभावनाओं पर पड़ सकता है।विशेषज्ञों का कहना है कि लोगों को अपनी आमदनी, घरेलू खर्च और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर ही मासिक किस्त तय करनी चाहिए।
स्थानीय भाषा में चलें जागरूकता अभियान
ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय जानकारी पहुंचाने के लिए स्थानीय भाषा और आसान उदाहरणों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। जागरूकता शिविरों, वीडियो, रेडियो, पोस्टर और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से लोगों को ब्याज, EMI और कर्ज की शर्तों के बारे में समझाया जा सकता है।
महेश शुक्ला के मुताबिक, मोबाइल फोन पर उपलब्ध लोन कैलकुलेटर की मदद से लोग कर्ज की किस्त का अनुमान लगा सकते हैं। वहीं, भुगतान की तारीख के रिमाइंडर से समय पर किस्त जमा करने में मदद मिल सकती है।
डिजिटल धोखाधड़ी से बचाव भी जरूरी
डिजिटल बैंकिंग और मोबाइल के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ऑनलाइन धोखाधड़ी का खतरा भी बढ़ा है। अजीत कुमार सिंह के मुताबिक, ग्रामीण लोगों को बैंकिंग जानकारी देने के साथ साइबर सुरक्षा के बारे में जागरूक करना भी जरूरी है। उन्हें OTP साझा नहीं करने, अनजान लिंक से बचने और नियमित रूप से अपनी क्रेडिट रिपोर्ट जांचने की जानकारी दी जानी चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण वित्तीय जागरूकता के कार्यक्रम लगातार चलने चाहिए। इनकी सफलता केवल कार्यक्रमों में शामिल होने वाले लोगों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जानी चाहिए कि लोग कर्ज की शर्तों को कितना समझ रहे हैं और आर्थिक फैसले कितनी समझदारी से ले पा रहे हैं। सही जानकारी ग्रामीण परिवारों को कर्ज का बेहतर इस्तेमाल करने और अनावश्यक आर्थिक बोझ से बचने में मदद कर सकती है।