Polyhouse farming: जहां सूखा, अनियमित बारिश और कम पानी खेती को घाटे का सौदा बना देते हैं, वहीं महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले के एक किसान ने यह साबित कर दिया कि सही तकनीक और सोच हो तो सूखी जमीन भी सोना उगल सकती है। पिंपरी लोकाई गांव के किसान सुभाष विट्ठल गाडगे ने पारंपरिक खेती की सीमाओं को तोड़ते हुए आधुनिक तकनीक अपनाई और पॉलीहाउस खेती के जरिए ₹15 लाख का शुद्ध मुनाफा कमा लिया। उनकी यह कहानी उन हजारों किसानों के लिए उम्मीद की किरण है, जो पानी की कमी से जूझ रहे हैं।
खेती से जुड़ा 25 साल का अनुभव
47 वर्षीय सुभाष गाडगे ने 10वीं तक पढ़ाई करने के बाद खेती को ही अपना जीवन बना लिया। उन्हें खेती-किसानी का 25 साल से ज्यादा का अनुभव है। उनके पास कुल 2.4 हेक्टेयर जमीन है, जिसमें से 1.6 हेक्टेयर बारिश पर निर्भर है और सिर्फ 0.4 हेक्टेयर सिंचित भूमि है। इसके साथ ही वे इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम के तहत 10 गाय भी पालते हैं, जिससे उन्हें दूध, गोबर और जैविक खाद के रूप में अतिरिक्त आमदनी और संसाधनों का बेहतर उपयोग मिलता है।
सूखा बना सबसे बड़ी चुनौती
इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) के अनुसार, सुभाष गाडगे को भी अपने क्षेत्र के अन्य किसानों की तरह लंबे समय तक अनियमित बारिश और सूखे का सामना करना पड़ा। सोयाबीन, बाजरा और चना जैसी पारंपरिक फसलों से लागत तो निकल जाती थी, लेकिन मुनाफा बेहद सीमित रहता था।बार-बार फसल खराब होने से उन्होंने यह महसूस किया कि अगर खेती में बदलाव नहीं किया गया, तो भविष्य और भी मुश्किल हो सकता है।
ट्रेनिंग से बदली सोच, पॉलीहाउस से बदली किस्मत
एक स्थायी समाधान की तलाश में सुभाष गाडगे ने कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से संरक्षित खेती की विशेष ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग के बाद उन्होंने साल 2016 में 3,000 वर्ग मीटर का पॉलीहाउस स्थापित किया। पॉलीहाउस की कुल लागत ₹35 लाख आई, जिसमें से ₹11 लाख की सब्सिडी उन्हें राज्य सरकार से मिली। इसके बाद उन्होंने ड्रिप सिंचाई और प्रिसिजन फार्मिंग तकनीक के जरिए रंगीन शिमला मिर्च (कैप्सिकम) की खेती शुरू की।
20 टन उत्पादन, 15 लाख का शुद्ध मुनाफा
2025 के सीजन में उन्होंने 1 जून को लाल और पीली शिमला मिर्च की रोपाई की। अब तक वे 20 टन हाई क्वालिटी कैप्सिकम की कटाई कर चुके हैं। सीजन के दौरान बाजार में शिमला मिर्च की कीमतें ₹60 से ₹300 प्रति किलो तक रहीं, जिसमें उन्हें औसतन ₹100 प्रति किलो का भाव मिला। इससे उनकी कुल कमाई करीब ₹20 लाख रही। करीब ₹5 लाख के ऑपरेशनल खर्च निकालने के बाद उन्हें ₹15 लाख का नेट मुनाफा हुआ। आने वाले तीन महीनों में उन्हें 10 टन अतिरिक्त उत्पादन की भी उम्मीद है।
बड़े शहरों तक बनाई सीधी पहुंच
स्थानीय बाजार की सीमित मांग को देखते हुए सुभाष गाडगे ने पहले ही मुंबई, नासिक, अहमदाबाद और इंदौर जैसे बड़े शहरों में मार्केटिंग नेटवर्क तैयार कर लिया था। लगातार अच्छी क्वालिटी और भरोसेमंद सप्लाई के चलते अब खरीदार सीधे गांव आकर कॉन्ट्रैक्ट पर उपज खरीदते हैं। उन्होंने लागत कम करने के लिए कीटनाशक और पोषक तत्व थोक में खरीदे, जिससे मुनाफा और बढ़ा।
किसानों के लिए प्रेरणा बना मॉडल
सुभाष गाडगे यहीं नहीं रुके। उन्होंने आसपास के पॉलीहाउस किसानों को जोड़कर एक समूह बनाने की पहल की, जिससे थोक खरीद, बेहतर कीमत और स्थिर सप्लाई संभव हो सकी। उनकी सफलता की कहानी यह दिखाती है कि पॉलीहाउस और संरक्षित खेती पानी की कमी वाले इलाकों में भी किसानों की आय बढ़ा सकती है। सही ट्रेनिंग, तकनीक और बाजार की समझ के साथ खेती आज भी मुनाफे का मजबूत साधन बन सकती है।