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आरबीआई ने रेपो रेट 5.25% पर रखा स्थिर, EMI में राहत बरकरार, 3–5 जून को होगी MPC की अगली बैठक

Last updated: 09/04/2026 10:58 AM
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Industrial Empire
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आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा मौद्रिक नीति समीक्षा के दौरान रेपो रेट 5.25% पर स्थिर रखने की घोषणा करते हुए, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच “वेट एंड वॉच” रणनीति पर जोर देते हुए दिखाई दे रहे हैं।
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा में रेपो रेट 5.25% पर स्थिर रखने का फैसला किया है। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने घोषणा करते हुए कहा कि बदलते वैश्विक हालात और ग्रोथ-इंफ्लेशन को देखते हुए फिलहाल अभी “वेट एंड वॉच” की रणनीति अपनाना बेहतर है। इससे पहले आखिरी बार दिसंबर 2025 में इसमें 25 बेसिस प्वाइंट्स की कटौती कर इसे 5.25% किया गया था जोकि अभी भी यह इस पर बना हुआ है।

होम लोन पर रेपो रेट का क्या पड़ता है असर?
रेपो रेट में कोई बदलाव न होने का सीधा असर होम लोन धारकों पर पड़ता है क्योंकि ज्यादातर होम लोन रेपो रेट में बदलाव के कारण प्रभावित होते हैं । यही वह दर है जिस पर भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) बैंकों को कर्ज देता है और बैंक उसी आधार पर ग्राहकों को लोन देते हैं, जिसका मतलब है कि फिलहाल होम लोन की ब्याज दरों और आपकी EMI में कोई बदलाव नहीं होगा, जबकि दिसंबर 2025 में हुई 0.25% कटौती का फायदा अभी भी फ्लोटिंग रेट लोन लेने वालों को मिल रहा है। आम तौर पर जब रेपो रेट बढ़ता है तो होम लोन महंगा होकर EMI बढ़ जाती है और जब यह घटता है तो EMI कम हो जाती है।

आरबीआई का रुख न्यूट्रल, रेपो रेट में कटौती की उम्मीद नहीं
मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) से रेपो रेट में कटौती की उम्मीद कम नजर आ रही है, क्योंकि इकोनॉमिस्ट मानते हैं कि केंद्रीय बैंक का फोकस इस समय दरें घटाने के बजाय वित्तीय बाजारों को स्थिर बनाए रखने पर है, इसके तहत RBI सिस्टम में लिक्विडिटी बढ़ाने, रुपये को सपोर्ट देने और बॉन्ड यील्ड को नियंत्रित करने जैसे कदमों को प्राथमिकता दे सकता है, ताकि बाजार में अनावश्यक उतार-चढ़ाव को रोका जा सके। साथ ही, पश्चिम एशिया में जारी तनाव और उसके वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों का भी लगातार आकलन किया जा रहा है, क्योंकि इसका असर कच्चे तेल की कीमतों, महंगाई और निवेश के माहौल पर पड़ सकता है। ऐसे अनिश्चित माहौल में पॉलिसी मेकर्स “वेट एंड वॉच” रणनीति अपनाते हुए ब्याज दरों में किसी बड़े बदलाव से बचना चाहते हैं।

पश्चिम एशिया में युद्ध और भारत में ऊर्जा संकट का असर
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और संभावित ईरान युद्ध के चलते उभरते एनर्जी संकट का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहराता दिखाई दे रहा है, और इसी संदर्भ में HSBC की चीफ इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी का मानना है कि यदि यह ऊर्जा संकट लंबा खिंचता है, तो इसका असर केवल महंगाई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आर्थिक विकास दर पर कहीं ज्यादा गंभीर चोट कर सकता है, उनका सुझाव है कि ऐसी परिस्थिति में नीतियां इस तरह बनाई जानी चाहिए जो मांग (डिमांड) को प्रोत्साहित करें, न कि उसे दबाएं। दरअसल, पूरा आउटलुक कच्चे तेल की कीमतों और सप्लाई में व्यवधान की अवधि पर निर्भर करेगा—अगर क्रूड ऑयल औसतन 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहता है, तो भारत की GDP ग्रोथ 7% से घटकर 6.3% तक आ सकती है, जबकि 100 डॉलर के करीब कीमतें रहने पर यह 6% तक गिर सकती है।

भारत की GDP ग्रोथ पर RBI का आकलन
RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) द्वारा जारी किए गए नए GDP आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष देश की वास्तविक GDP ग्रोथ दर 7.6% रहने का अनुमान है। उन्होंने यह भी कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में संभावित रुकावटें इस वर्ष की आर्थिक वृद्धि पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं। हालाँकि, इस साल सरकार ने आवश्यक सेक्टरों में कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय उपाय किए हैं, ताकि सप्लाई चेन में आने वाली समस्याओं को कम किया जा सके। इसके अलावा, व्यापार से जुड़ी उम्मीदें अभी भी सकारात्मक बनी हुई हैं।

इस वर्ष की तिमाही GDP ग्रोथ का अनुमान निम्नलिखित है:

  • पहली तिमाही (Q1): 6.8%
  • दूसरी तिमाही (Q2): 6.7%
  • तीसरी तिमाही (Q3): 7.0%
  • चौथी तिमाही (Q4): 7.2%

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