रुपये ने बुधवार को इतिहास का सबसे निचला स्तर छू लिया। पहली बार भारतीय रुपया एक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90 रुपये के पार चला गया। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर बड़ा असर डालने वाला संकेत है।
रुपये की इस गिरावट के पीछे कई कारण हैं, विदेशी निवेशकों का भारत से पैसा निकालना। कच्चे तेल की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतें। भारत–अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता और सबसे बड़ी बात, ज़्यादातर समय पर RBI की ओर से हस्तक्षेप न होना।
लेकिन इस गिरावट का असर सिर्फ बाजारों तक सीमित नहीं है। अब इसका सीधा बोझ आपकी जेब पर पड़ने वाला है—चाहे पेट्रोल-डीजल हो, आपका मोबाइल फोन, लैपटॉप, बच्चों की पढ़ाई या विदेश यात्रा का खर्च।
क्यों बढ़ेंगे दाम?
भारत अपनी कई ज़रूरतें विदेशों से पूरी करता है। 90% कच्चा तेल आयात किया जाता है। 60% से अधिक खाने का तेल बाहर से आता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, गैजेट्स, कार के पुर्जे, उर्वरक, सब बड़े स्तर पर आयात होते हैं। कमजोर रुपया मतलब ये कि इन सभी चीजों को खरीदने के लिए अब हमें पहले से ज्यादा डॉलर चुकाने पड़ेंगे। और इसका सीधा मतलब है—इनकी कीमतें भारत में बढ़ जाएंगी।
किन चीजों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा?
- स्मार्टफोन, लैपटॉप, फ्रिज, टीवी जैसी इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं और महंगी होंगी
- पेट्रोल, डीजल और एलपीजी सिलेंडर के दाम बढ़ने की पूरी संभावना
- खाने का तेल जैसे जरूरी सामान महंगे होंगे
- विदेश यात्रा का खर्च बढ़ना तय
- विदेश में पढ़ रहे छात्रों की फीस बढ़ेगी
- कार–बाइक बनाने में इस्तेमाल होने वाले आयातित पार्ट्स महंगे होंगे, इसलिए वाहनों के दाम भी बढ़ सकते हैं
ऐसे समय में रुपये की यह कमजोरी आम भारतीय परिवार के बजट पर सीधा दबाव डाल रही है। खासतौर पर निम्न और मध्यम वर्ग के लिए यह चिंता का विषय बनती जा रही है। ऐसे समय में रुपये की यह कमजोरी आम भारतीय परिवार के बजट पर सीधा असर डाल रही है। रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर बच्चों की पढ़ाई, किराया, बिजली-पानी के बिल और स्वास्थ्य खर्च तक—हर जगह महंगाई का दबाव साफ महसूस किया जा रहा है। जब रुपया गिरता है तो आयातित सामान महंगा होता है, जिसमें तेल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयां और कई जरूरी उपभोक्ता उत्पाद शामिल हैं। इससे बाजार में कीमतें बढ़ती हैं और परिवारों को अपने खर्चों में कटौती करनी पड़ती है। कई घरों में मासिक बचत लगभग खत्म हो चुकी है और लोग सोच-समझकर ही खर्च करने को मजबूर हो रहे हैं।
खासतौर पर निम्न और मध्यम वर्ग के लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। इन वर्गों की आय सीमित होती है, इसलिए कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी बजट बिगाड़ देती है। पेट्रोल-डीजल महंगे होने से बस-ऑटो किराया बढ़ता है, जिससे नौकरीपेशा लोगों के मासिक खर्च पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें पोषण और जरूरी खरीदारी पर सीधा असर डालती हैं। कुल मिलाकर, रुपये की कमजोरी केवल आर्थिक आंकड़ों का मामला नहीं है—यह सीधे भारतीय परिवारों की जीवनशैली, उनकी प्राथमिकताओं और उनकी दैनिक जरूरतों को प्रभावित करने वाली वास्तविक चुनौती बन चुकी है।