दवा उद्योग में मार्केटिंग के तरीकों को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने अहम कदम उठाया है। अदालत ने केंद्र सरकार को दो सप्ताह के भीतर एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया है। समिति दवा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग से जुड़े मामलों, मौजूदा नियमों की प्रभावशीलता और उनके उल्लंघन पर कार्रवाई की व्यवस्था का आकलन करेगी। इसका उद्देश्य मरीजों के हितों की रक्षा करने के साथ नैतिक और किफायती स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देना है।
गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026 को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह निर्देश जारी किया। अदालत के मुताबिक, समिति को संबंधित पक्षों और विषय विशेषज्ञों से विचार-विमर्श करना होगा। अपनी पहली बैठक के दो महीने के भीतर उसे केंद्र सरकार के सामने सिफारिशें प्रस्तुत करनी होंगी। इसके बाद सरकार को इन सिफारिशों पर विचार कर तर्कसंगत निर्णय लेना होगा।
डॉक्टरों को प्रभावित करने वाली मार्केटिंग पर सवाल
यह मामला दवा कंपनियों की ओर से डॉक्टरों को कथित तौर पर महंगे उपहार, विदेश यात्राएं और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के आरोपों से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस तरह के प्रलोभनों का उद्देश्य डॉक्टरों को विशेष कंपनियों की दवाएं लिखने के लिए प्रभावित करना हो सकता है।
इस मामले में फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FMRAI) सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने दवा उद्योग की मार्केटिंग गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण की जरूरत उठाई है। उनका तर्क है कि दवाओं के चयन में मरीज की जरूरत, दवा की गुणवत्ता और उसकी चिकित्सकीय उपयोगिता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, न कि किसी कंपनी की व्यावसायिक रणनीति को।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी आशंका जताई कि अनुचित तरीके से प्रभावित किए गए प्रिस्क्रिप्शन का असर जनस्वास्थ्य पर पड़ सकता है। इसमें दवाओं के प्रतिकूल प्रभाव और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस जैसी समस्याएं शामिल हैं। एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस की स्थिति में बैक्टीरिया और अन्य रोगाणुओं पर दवाओं का असर कम होने लगता है, जिससे संक्रमण का उपचार मुश्किल हो सकता है।
मौजूदा नियामकीय व्यवस्था की होगी व्यापक जांच
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी नियामकीय व्यवस्था की सफलता केवल नियमों के मौजूद होने से तय नहीं होती। यह देखना भी जरूरी है कि नियमों की निगरानी कैसे की जा रही है, शिकायतों पर कितनी प्रभावी कार्रवाई होती है और उनका पालन सुनिश्चित करने के लिए कौन-से तंत्र काम कर रहे हैं।
विशेषज्ञ समिति मौजूदा वैधानिक और नियामकीय ढांचे की पर्याप्तता का परीक्षण करेगी। साथ ही, निगरानी, निरीक्षण और नियमों के प्रवर्तन से जुड़ी व्यवस्थाओं में सुधार के उपाय भी सुझाएगी। समिति की समीक्षा में पारदर्शिता बढ़ाने, जवाबदेही तय करने और अनुपालन को प्रभावी बनाने जैसे विषय शामिल होंगे।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि फार्मास्युटिकल उद्योग के व्यावसायिक हितों और आम नागरिकों के स्वास्थ्य के बीच संतुलन जरूरी है। दवा उद्योग अनुसंधान, नई दवाओं के विकास और स्वास्थ्य सेवाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन उसकी व्यावसायिक गतिविधियां जनहित और नैतिक मानकों के अनुरूप होनी चाहिए।
UCPMP 2024 और कानूनी व्यवस्था पर चर्चा
दवा कंपनियों की मार्केटिंग को नियंत्रित करने के लिए देश में यूनिफॉर्म कोड फॉर फार्मास्यूटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज (UCPMP), 2024 लागू है। केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि यह व्यवस्था काफी हद तक प्रभावी रही है। हालांकि, इस बात पर विचार की जरूरत बनी हुई है कि क्या दवा कंपनियों को नियंत्रित करने के लिए अधिक मजबूत और कानूनी रूप से बाध्यकारी ढांचा तैयार किया जाना चाहिए।
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि मौजूदा व्यवस्था मुख्य रूप से चिकित्सा पेशेवरों के आचरण को नियंत्रित करती है। दवा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों के प्रिस्क्रिप्शन संबंधी निर्णयों को प्रभावित करने के मामलों में कार्रवाई के लिए अलग तंत्र की आवश्यकता हो सकती है।
इससे फार्मा उद्योग के लिए अनुपालन संबंधी नियमों और उल्लंघन की स्थिति में जवाबदेही तय करने की व्यवस्था पर बहस फिर तेज हो गई है।
पहले भी हो चुका है नियामकीय सुधार पर विचार
सितंबर 2022 में केंद्र सरकार ने नीति आयोग के तत्कालीन सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. वी.के. पॉल की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी। इस समिति को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं का अध्ययन करने और फार्मा मार्केटिंग के लिए कानूनी रूप से लागू किए जा सकने वाले नियमों की जरूरत का आकलन करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
उस समिति ने तत्काल UCPMP को वैधानिक दर्जा देने के बजाय मौजूदा व्यवस्था को मजबूत करने का सुझाव दिया था। इसमें स्वतंत्र समीक्षा, शिकायतों की बेहतर निगरानी और अधिक जानकारी सार्वजनिक करने जैसे उपाय शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य सरकार के नीतिगत अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करना नहीं, बल्कि संबंधित पक्षों की चिंताओं पर व्यापक और सार्थक विचार-विमर्श सुनिश्चित करना है। केंद्र को समिति की सिफारिशें पूरी होने के दो सप्ताह के भीतर अनुपालन हलफनामा दाखिल करना होगा। मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी 2027 को निर्धारित की गई है।
अब विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर नजर रहेगी। उसके निष्कर्ष यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं कि भारत में दवा कंपनियों की मार्केटिंग के मौजूदा नियमों को किस तरह मजबूत किया जाए और मरीजों के हितों को अधिक प्रभावी ढंग से कैसे सुरक्षित रखा जाए।