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The Industrial Empire - उद्योग, व्यापार और नवाचार की दुनिया | The World of Industry, Business & Innovation > ट्रेंडिंग खबरें > Trump का यू-टर्न: “अमेरिका को चाहिए टैलेंटेड लोग”, H-1B वीजा का किया बचाव
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Trump का यू-टर्न: “अमेरिका को चाहिए टैलेंटेड लोग”, H-1B वीजा का किया बचाव

Last updated: 13/11/2025 4:13 PM
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Industrial Empire
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Donald Trump speaking about H-1B visa policy shift and America’s need for skilled workers
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
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अमेरिका में H-1B वीजा को लेकर एक बड़ा मोड़ देखने को मिला है। राष्ट्रपति Donald Trump, जो कभी इस वीजा प्रोग्राम के सबसे बड़े आलोचक माने जाते थे, अब उसके समर्थन में बोलते नजर आए हैं। दो महीने पहले तक उन्होंने H-1B वीजा की फीस को 1 लाख डॉलर (करीब 88 लाख रुपये) तक बढ़ाने का ऐलान किया था। लेकिन अब वही ट्रंप कह रहे हैं कि “अमेरिका को टैलेंटेड लोगों की जरूरत है” और इस काम में H-1B वीजा ही देश की मदद कर सकता है।

क्या कहा ट्रंप ने?
फॉक्स न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, “आपको टैलेंट को देश में लाना होगा। आपके पास कुछ खास टैलेंट वाले लोग नहीं हैं। आपको ऐसा करना ही होगा।” उन्होंने आगे कहा, “आप बेरोजगारी की कतार में खड़े किसी भी व्यक्ति को मिसाइल बनाने या हाई-टेक काम करने के लिए नहीं भेज सकते। उसके लिए स्किल और ट्रेनिंग चाहिए।”

ट्रंप का ये बयान उस वक्त आया है जब अमेरिका में कई हाई-टेक इंडस्ट्रीज को स्किल्ड प्रोफेशनल्स की भारी कमी झेलनी पड़ रही है। हालांकि ट्रंप ने इंटरव्यू के दौरान सीधे तौर पर “H-1B वीजा” का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके बयान से साफ झलकता है कि वे अब इस प्रोग्राम को देश की जरूरत के रूप में देखने लगे हैं।

क्या है H-1B वीजा प्रोग्राम?
H-1B वीजा अमेरिकी सरकार द्वारा जारी किया जाने वाला एक वर्क परमिट वीजा है, जो विदेशों से आने वाले स्पेशलाइज्ड स्किल वाले प्रोफेशनल्स को अमेरिका में काम करने की अनुमति देता है। हर साल अमेरिका में 65 हजार H-1B वीजा जारी किए जाते हैं। इसके अलावा 20 हजार अतिरिक्त वीजा उन लोगों के लिए आरक्षित होते हैं जिन्होंने अमेरिकी यूनिवर्सिटी से मास्टर्स या उससे ऊंची डिग्री हासिल की है।टेक्नोलॉजी, हेल्थकेयर, फाइनेंस, रिसर्च और एजुकेशन जैसे सेक्टरों की हजारों कंपनियां इस वीजा के जरिए विदेशी कर्मचारियों को हायर करती हैं। यही वजह है कि सिलिकॉन वैली से लेकर यूनिवर्सिटी लैब्स तक, H-1B वर्कर्स अमेरिकी इनोवेशन की रीढ़ बन चुके हैं।

भारत सबसे बड़ा लाभार्थी देश
H-1B वीजा का सबसे बड़ा लाभार्थी देश भारत है। पिछले साल जारी किए गए कुल वीज़ाओं में से करीब 70 फीसदी भारतीय नागरिकों को मिले। इसके बाद चीन का नंबर आता है, जिसके लगभग 11 फीसदी प्रोफेशनल्स को यह वीजा जारी किया गया। भारतीय आईटी कंपनियाँ जैसे इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो और एचसीएल हर साल बड़ी संख्या में अपने इंजीनियर्स को इसी वीजा पर अमेरिका भेजती हैं। हालांकि, जब सितंबर में ट्रंप प्रशासन ने H-1B फीस को 1 लाख डॉलर तक बढ़ाने का प्रस्ताव रखा, तो टेक कंपनियों में हड़कंप मच गया था। उनका कहना था कि इससे विदेशी टैलेंट को हायर करना बहुत महंगा और जटिल हो जाएगा। लेकिन अब राष्ट्रपति ट्रंप का रुख बदलने से टेक इंडस्ट्री को राहत मिली है।

अमेरिकी कंपनियों की बढ़ती जरूरत
अमेरिका में AI, Robotics, Cybersecurity, Data Science और Healthcare जैसे हाई-स्किल सेक्टर तेजी से बढ़ रहे हैं। इन क्षेत्रों में स्थानीय टैलेंट की कमी होने के कारण कंपनियों को विदेशी स्किल्ड वर्कर्स की ओर रुख करना पड़ता है। H-1B वीजा ऐसे वर्कर्स को कानूनी तौर पर अमेरिका में काम करने की अनुमति देता है, जिससे कंपनियां अपने प्रोजेक्ट पूरे कर पाती हैं और इनोवेशन की रफ्तार बनी रहती है।टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर H-1B प्रोग्राम को और आसान बनाया गया, तो इससे न सिर्फ अमेरिकी कंपनियों को बल्कि वैश्विक प्रतिभा विनिमय (Global Talent Exchange) को भी बड़ा फायदा होगा।

ट्रंप की राजनीतिक रणनीति या आर्थिक मजबूरी?
विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप का यह यू-टर्न सिर्फ टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री के दबाव का परिणाम नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की मौजूदा आर्थिक स्थिति से भी जुड़ा है। महामारी के बाद से अमेरिका में बेरोजगारी घटने के बावजूद हाई-स्किल टैलेंट की कमी लगातार बढ़ी है। इसके अलावा, चीन और भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएँ अब अपने यहाँ बेहतर अवसर दे रही हैं, जिससे अमेरिका के लिए टैलेंट आकर्षित करना मुश्किल होता जा रहा है। इसलिए ट्रंप प्रशासन अब यह समझ चुका है कि टेक्नोलॉजी सेक्टर की ग्रोथ टैलेंट के बिना संभव नहीं। और यह टैलेंट ज्यादातर एशियाई देशों, खासकर भारत से आता है।

बदलते अमेरिका की नई दिशा
डोनाल्ड ट्रंप का H-1B वीजा पर रुख बदलना अमेरिकी नीति में एक महत्वपूर्ण संकेत है। यह दिखाता है कि अब अमेरिका अपने दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं कर सकता। टैलेंट और इनोवेशन की दौड़ में टिके रहने के लिए उसे वैश्विक दिमागों की जरूरत है चाहे वे भारत से आएं, चीन से या किसी और देश से। H-1B वीजा एक वर्क परमिट नहीं, बल्कि अमेरिका के लिए टेक्नोलॉजी और इकोनॉमी को आगे बढ़ाने का इंजन बन चुका है। और ट्रंप का ताज़ा बयान यह साफ करता है कि आने वाले दिनों में इस प्रोग्राम को और भी मजबूती मिल सकती है।

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