US-Iran tensions: वैश्विक तेल बाजार एक बार फिर भू-राजनीतिक तनाव की गिरफ्त में है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने कच्चे तेल की कीमतों को लेकर नई आशंकाएँ पैदा कर दी हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि यदि हालात और बिगड़ते हैं तो ब्रेंट क्रूड 95 से 110 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है। वहीं, यदि तनाव कम हो जाता है और सप्लाई सामान्य रहती है, तो कीमतें 60 डॉलर तक भी गिर सकती हैं।
सैन्य तनाव और बाजार की घबराहट
पश्चिम एशिया में अमेरिका की बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ा दी है। पिछले दिनों तेल की कीमतों में लगभग 10 प्रतिशत की तेजी देखी गई, जो साफ संकेत है कि निवेशक संभावित सप्लाई संकट को लेकर चिंतित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि तेल बाजार में भाव केवल मांग-सप्लाई से तय नहीं होते, बल्कि भू-राजनीतिक जोखिम भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। यदि अमेरिका-ईरान टकराव खुली सैन्य कार्रवाई में बदलता है, तो तेल आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो सकती है। इसी आशंका के कारण ट्रेडर्स “रिस्क प्रीमियम” जोड़कर कीमतों को ऊपर धकेल रहे हैं।
स्ट्रेट ऑफ होरमज: दुनिया की ऊर्जा लाइफलाइन
तनाव का सबसे बड़ा केंद्र स्ट्रेट ऑफ होरमज है, जिसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की लाइफलाइन माना जाता है। हर दिन लगभग 20 मिलियन बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद इसी समुद्री रास्ते से गुजरते हैं। दुनिया की करीब 20 प्रतिशत गैस सप्लाई भी इसी मार्ग पर निर्भर है। यदि किसी संघर्ष के कारण यह रास्ता प्रभावित होता है, तो तेल की कीमतों में अचानक 20 से 40 डॉलर प्रति बैरल तक का अतिरिक्त उछाल आ सकता है। यही वजह है कि बाजार इस क्षेत्र की हर सैन्य गतिविधि पर नजर रखे हुए है।
110 डॉलर का जोखिम परिदृश्य
ऊर्जा विश्लेषकों का कहना है कि यदि होरमज क्षेत्र में आपूर्ति बाधित होती है, तो ब्रेंट क्रूड 95 से 110 डॉलर प्रति बैरल या उससे भी ऊपर जा सकता है। मौजूदा स्तर से यह लगभग 50-60 प्रतिशत की तेजी होगी। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि लंबी अवधि तक पूरी सप्लाई रुकना आसान नहीं है। ऐसा तभी संभव है जब ईरान इस समुद्री मार्ग को पूरी तरह बंद कर दे, जो एक अत्यधिक चरम स्थिति मानी जाती है।
समझौता हुआ तो 60 डॉलर तक गिरावट
दूसरी ओर, यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होता है या कोई कूटनीतिक समाधान निकलता है, तो तेल बाजार में तेजी से राहत आ सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि ऐसी स्थिति में ब्रेंट की कीमतें 60 डॉलर प्रति बैरल तक गिर सकती हैं। इसके पीछे तर्क यह है कि बाजार में पहले से ही अतिरिक्त उत्पादन क्षमता मौजूद है। यदि भू-राजनीतिक जोखिम कम हो जाए, तो ट्रेडर्स का “डर प्रीमियम” खत्म हो जाएगा और कीमतें नीचे आ सकती हैं।
ईरान की उत्पादन क्षमता का असर
ईरान रोज लगभग 3.3 मिलियन बैरल तेल का उत्पादन करता है। यदि युद्ध या प्रतिबंधों के कारण इस उत्पादन पर असर पड़ता है, तो वैश्विक सप्लाई संतुलन बिगड़ सकता है। इससे कीमतों में तेजी आना स्वाभाविक है। लेकिन विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि दुनिया के अन्य बड़े उत्पादक देशों के पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता है, जो आपूर्ति की कमी को आंशिक रूप से पूरा कर सकती है। इसलिए लंबी अवधि में कीमतों पर दबाव सीमित रह सकता है।
प्रतिबंध हटे तो बाजार में अतिरिक्त तेल
एक संभावित परिदृश्य यह भी है कि भविष्य में यदि ईरान पर लगे प्रतिबंध हटते हैं और वह खुले बाजार में ज्यादा तेल निर्यात करने लगता है, तो वैश्विक सप्लाई बढ़ जाएगी। फिलहाल ईरान के पास लगभग 0.3 से 0.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन अतिरिक्त उत्पादन क्षमता मानी जाती है। यदि यह तेल बाजार में आता है, तो कीमतों पर नीचे की ओर दबाव बनेगा और वैश्विक ऊर्जा बाजार को राहत मिल सकती है।
आगे क्या देखें निवेशक और उपभोक्ता
तेल बाजार का भविष्य अमेरिका-ईरान संबंधों पर काफी हद तक निर्भर करता है। यदि तनाव बढ़ता है, तो तेल 100 डॉलर के पार जा सकता है, जिससे वैश्विक महंगाई और ऊर्जा लागत बढ़ेगी। वहीं, कूटनीतिक समाधान निकलता है तो कीमतों में बड़ी गिरावट संभव है। इस समय निवेशक, सरकारें और ऊर्जा कंपनियाँ तीन चीजों पर नजर रखे हुए हैं—होरमज क्षेत्र की सुरक्षा, अमेरिका-ईरान सैन्य गतिविधि और वैश्विक अतिरिक्त उत्पादन क्षमता। यही कारक तय करेंगे कि आने वाले महीनों में तेल बाजार उछलेगा या शांत होगा।