Winter Farming in Hills: जब दिसंबर–जनवरी में मैदानी इलाकों के लोग ठंड से बचने के लिए रजाई में दुबक जाते हैं, उसी समय हिमालयी क्षेत्रों के किसान माइनस डिग्री तापमान और बर्फ के बीच खेतों में जुटे रहते हैं। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और कश्मीर जैसे पहाड़ी राज्यों में सर्दियों की खेती आसान नहीं होती, लेकिन अब यह नामुमकिन भी नहीं रही। पारंपरिक अनुभव और आधुनिक तकनीक के मेल ने पहाड़ों में ठंड के मौसम को खेती के लिए एक सुनहरे मौके में बदल दिया है।
पहाड़ों में सर्दियों की खेती क्यों है खास?
पहाड़ी इलाकों में सर्दियों के दौरान पाला, बर्फबारी और पानी की कमी सबसे बड़ी चुनौतियां होती हैं। तापमान कई बार शून्य से नीचे चला जाता है, जिससे मिट्टी जम जाती है और फसलों के खराब होने का खतरा बढ़ जाता है। बावजूद इसके, यहां के किसान दशकों से इन परिस्थितियों के अनुसार खेती करते आए हैं। हाल के वर्षों में तकनीक ने उनकी मेहनत को और असरदार बना दिया है, जिससे सर्दियों की खेती अब मुनाफे का सौदा बनती जा रही है।
पॉलीहाउस और ग्रीनहाउस: ठंड से बचाव की ढाल
पहाड़ों में सर्दियों की खेती का सबसे बड़ा सहारा पॉलीहाउस और ग्रीनहाउस तकनीक है। यह प्लास्टिक शीट या शीशे से बना एक ढांचा होता है, जो सूरज की गर्मी को अंदर रोककर रखता है। बाहर तापमान भले ही 0 डिग्री या उससे नीचे हो, लेकिन पॉलीहाउस के अंदर 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तक तापमान बना रहता है। इस नियंत्रित माहौल में सब्जियां और अन्य फसलें आसानी से उगाई जाती हैं।
मल्चिंग तकनीक: मिट्टी को रखे गर्म और नम
सर्दियों में मिट्टी के जमने से पौधों की जड़ें खराब हो सकती हैं। इससे बचने के लिए पहाड़ी किसान ‘मल्चिंग’ तकनीक अपनाते हैं। इसमें खेत की मिट्टी के ऊपर प्लास्टिक शीट, सूखी घास या पत्तियां बिछा दी जाती हैं। इससे मिट्टी की नमी और गर्मी बनी रहती है और ठंड का सीधा असर पौधों पर नहीं पड़ता। यह तरीका कम लागत में फसल को सुरक्षित रखने का कारगर उपाय है।
सर्दियों में पहाड़ों में कौन-सी फसलें उगती हैं?
ठंडे मौसम में भी कई ऐसी फसलें हैं जो पहाड़ी इलाकों में बेहतर उत्पादन देती हैं। मटर यहां की सबसे लोकप्रिय सर्दियों की फसल है, जो अपनी मिठास के लिए देशभर में मशहूर है। इसके अलावा लहसुन और प्याज बर्फबारी को भी सहन कर लेते हैं। ब्रोकली, बंदगोभी और अन्य विदेशी सब्जियों की मांग शहरों में ज्यादा रहती है, जिसे पहाड़ी किसान सर्दियों में पूरा करते हैं। कश्मीर के ऊंचे इलाकों में केसर की खेती भी इसी मौसम से जुड़ी होती है। वहीं, सेब के बागानों में सर्दियों के दौरान छंटाई की जाती है, ताकि गर्मियों में अच्छी पैदावार मिल सके।
खेती का तरीका और पानी की व्यवस्था
पहाड़ों में ढलान वाली जमीन होने के कारण सीढ़ीदार खेत बनाए जाते हैं। सर्दियों में झरने और नालों का पानी जम जाने से सिंचाई की समस्या होती है। ऐसे में किसान बर्फ को स्टोर करते हैं या ड्रिप इरिगेशन जैसी तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। गोबर की खाद और अन्य जैविक खाद का उपयोग ज्यादा किया जाता है, क्योंकि ये मिट्टी को प्राकृतिक रूप से गर्म रखने में मदद करती हैं।
ऑफ-सीजन फार्मिंग से बढ़ी किसानों की कमाई
पहाड़ों में सर्दियों की खेती को ‘ऑफ-सीजन फार्मिंग’ कहा जाता है। जब मैदानी इलाकों में कुछ सब्जियां उपलब्ध नहीं होतीं, तब पहाड़ों से ताजा उत्पादन शहरों की मंडियों तक पहुंचता है। इस दौरान किसानों को सामान्य समय की तुलना में तीन से चार गुना तक बेहतर कीमत मिलती है। यही वजह है कि अब युवा किसान भी सर्दियों की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
बर्फ में छुपा है खेती का भविष्य
पहाड़ों में कड़ाके की ठंड में खेती करना मेहनत, धैर्य और सही तकनीक की मांग करता है। पॉलीहाउस, मल्चिंग, ड्रिप इरिगेशन और ऑर्गेनिक खेती जैसी आधुनिक विधियों ने बर्फबारी को बाधा नहीं, बल्कि अवसर बना दिया है। सही फसल और सही तकनीक के साथ पहाड़ों की बर्फीली चोटियां भी आज किसानों के लिए तरक्की और कमाई का रास्ता खोल रही हैं।