सोना हमेशा से भारतीयों के लिए सिर्फ एक कीमती धातु नहीं बल्कि भरोसे, सुरक्षा और निवेश का प्रतीक रहा है। जब भी दुनिया में आर्थिक अनिश्चितता बढ़ती है, बाजार में उतार-चढ़ाव आता है या महंगाई की चिंता बढ़ती है, निवेशक अक्सर सोने की तरफ रुख करते हैं। लेकिन हाल के दिनों में तस्वीर कुछ अलग नजर आ रही है। लगातार दबाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें छह महीने के निचले स्तर तक पहुंच गई हैं।
11 जून को वैश्विक बाजार में सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिली। भारत में भी इसका असर दिखाई दिया और घरेलू बाजार में सोने के भाव में नरमी आई। 24 कैरेट सोना करीब 1.48 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास कारोबार करता नजर आया, जबकि 22 कैरेट सोने की कीमत करीब 1.35 लाख से 1.37 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के बीच बनी रही।
सोने की चमक फीकी क्यों पड़ी?
सोने की कीमतों में गिरावट के पीछे कई बड़े कारण बताए जा रहे हैं। सबसे बड़ा कारण अमेरिका की आर्थिक स्थिति और वहां ब्याज दरों को लेकर बनी अनिश्चितता है। जब अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तो निवेशकों के लिए डॉलर आधारित निवेश आकर्षक हो जाता है। ऐसे में बिना ब्याज देने वाला सोना निवेशकों की पहली पसंद नहीं रह जाता। यही वजह है कि मजबूत डॉलर के कारण गोल्ड पर दबाव बढ़ा है। इसके अलावा अमेरिकी अर्थव्यवस्था में महंगाई के आंकड़े और फेडरल रिजर्व की नीतियों को लेकर बाजार सतर्क बना हुआ है। निवेशक यह अनुमान लगाने में लगे हैं कि आने वाले समय में ब्याज दरों में कटौती होगी या नहीं। इसी असमंजस का असर सोने की मांग पर पड़ा है।
मजबूत डॉलर बना सोने का दुश्मन
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत डॉलर में तय होती है। जब डॉलर मजबूत होता है तो दूसरे देशों के लिए सोना महंगा हो जाता है। इससे मांग प्रभावित होती है। हाल के समय में डॉलर इंडेक्स में मजबूती ने सोने की कीमतों को दबाव में रखा है। भारत जैसे देशों में जहां सोने का बड़ा हिस्सा आयात किया जाता है, वहां रुपये और डॉलर की चाल भी कीमतों को प्रभावित करती है।
क्या बड़े निवेशक सोने से दूरी बना रहे हैं?
गोल्ड को आमतौर पर सुरक्षित निवेश माना जाता है, लेकिन जब शेयर बाजार मजबूत होता है और जोखिम वाले निवेश बेहतर रिटर्न देने लगते हैं, तो कुछ निवेशक अपना पैसा इक्विटी जैसे विकल्पों में लगाना पसंद करते हैं। यही वजह है कि हाल के दिनों में कुछ बड़े निवेशकों ने सोने में अपनी हिस्सेदारी कम की है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी अवधि में सोने की मांग बनी रह सकती है क्योंकि केंद्रीय बैंक लगातार अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहे हैं।
भारत में सोने की मांग पर क्या असर पड़ेगा?
भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ताओं में शामिल है। यहां सोने की मांग सिर्फ निवेश के लिए नहीं बल्कि शादी-विवाह और त्योहारों से भी जुड़ी हुई है। कीमतों में गिरावट आने से ज्वेलरी खरीदने वालों को राहत मिल सकती है। अगर सोना लंबे समय तक कम कीमतों पर बना रहता है तो शादी के सीजन और त्योहारों के दौरान मांग में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
क्या यह खरीदारी का सही समय है?
सोने में गिरावट के बाद कई निवेशकों के मन में सवाल है कि क्या अब खरीदारी करनी चाहिए? विशेषज्ञों के मुताबिक सोने में निवेश हमेशा लंबी अवधि के नजरिए से करना बेहतर होता है। कम कीमतों पर धीरे-धीरे निवेश करना एक रणनीति हो सकती है, लेकिन केवल छोटी अवधि में कीमत बढ़ने की उम्मीद के आधार पर निवेश करना जोखिम भरा हो सकता है। बाजार में अमेरिका की नीतियां, डॉलर की चाल और वैश्विक घटनाएं आगे भी सोने की दिशा तय करेंगी।
आगे क्या हो सकता है सोने का भविष्य?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में सोने की कीमतों पर कई फैक्टर असर डालेंगे। अगर अमेरिका ब्याज दरों में कटौती करता है, डॉलर कमजोर होता है या वैश्विक स्तर पर तनाव बढ़ता है, तो सोने को फिर से मजबूती मिल सकती है। वहीं अगर ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं और डॉलर मजबूत बना रहता है, तो सोने पर दबाव जारी रह सकता है।
गिरावट के बीच भी बनी हुई है सोने की अहमियत
छह महीने के निचले स्तर पर पहुंचना सोने के बाजार के लिए बड़ी घटना है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सोने की अहमियत खत्म हो गई है। सोना आज भी दुनिया भर में एक भरोसेमंद एसेट माना जाता है। फिलहाल बाजार अमेरिका की आर्थिक नीतियों और वैश्विक संकेतों पर नजर बनाए हुए है। आने वाले महीनों में यही तय करेगा कि सोने की चमक फिर लौटेगी या कीमतों में और गिरावट देखने को मिलेगी।