नई दिल्ली: भारत की अर्थव्यवस्था की तस्वीर अब पहले से ज्यादा सटीक तरीके से सामने लाने की तैयारी है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के आकलन और सेवा क्षेत्र की गतिविधियों को मापने के तरीकों में बदलाव का प्रस्ताव रखा है। नई व्यवस्था में लोगों के खर्च करने के तौर-तरीकों, वाहनों के इस्तेमाल, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और वित्तीय सेवाओं से जुड़े आंकड़ों को अधिक विस्तार से शामिल किया जाएगा। इसके साथ ही यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के लेन-देन और सरकारी वेतन रिकॉर्ड का उपयोग करके सेवा क्षेत्र की गतिविधियों का बेहतर आकलन करने की योजना है।
GDP के आकलन में क्या बदलेगा?
मंत्रालय की ओर से जारी मसौदे के मुताबिक, GDP की 2022-23 आधार वर्ष वाली नई शृंखला में निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) के आकलन का दायरा बढ़ाया जाएगा। पहले जहां 46 मदों के आधार पर अनुमान तैयार किए जाते थे, वहीं नई व्यवस्था में करीब 128 मदों के लिए अनुमान तैयार करने का प्रस्ताव है।
निजी अंतिम उपभोग व्यय से पता चलता है कि देश के परिवार वस्तुओं और सेवाओं पर कितना खर्च कर रहे हैं। इसमें खाने-पीने की चीजों, कपड़ों, मकान, किराए, परिवहन, मनोरंजन, शिक्षा और इलाज जैसी जरूरतों पर होने वाला खर्च शामिल है।
मदों की संख्या बढ़ने से लोगों की खपत में हो रहे बदलावों को अधिक विस्तार से समझने में मदद मिल सकती है। इससे यह जानना आसान होगा कि किन वस्तुओं और सेवाओं की मांग बढ़ रही है और किन क्षेत्रों में लोगों के खर्च करने का तरीका बदल रहा है।
वाहनों और परिवहन के खर्च का भी होगा बेहतर आकलन
नई व्यवस्था में वाहनों की खरीद, ईंधन, मरम्मत और रखरखाव के साथ सड़क, रेल और हवाई यात्रा पर होने वाले खर्च को भी बेहतर तरीके से मापने पर जोर दिया गया है।
इसके लिए उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र समेत छह राज्यों और दिल्ली-एनसीआर में अध्ययन कराया गया। इसमें सड़क परिवहन और घरेलू वाहनों से होने वाली कमाई तथा उनके संचालन पर होने वाले खर्च की जानकारी जुटाई गई।
खर्च की श्रेणियों में भी बदलाव प्रस्तावित हैं। मक्खन और घी को डेयरी उत्पादों के बजाय तेल एवं वसा समूह में रखा जाएगा। आइसक्रीम को चीनी, कन्फेक्शनरी और डेजर्ट समूह में शामिल किया जाएगा। वहीं, सिलाई से जुड़े खर्च को कपड़ों की सफाई और मरम्मत वाली श्रेणी से जोड़ा जाएगा। संचार श्रेणी का नाम बदलकर सूचना एवं संचार करने का प्रस्ताव है। बीमा और वित्तीय सेवाओं के लिए अलग समूह भी बनाया जाएगा।
महंगाई और वास्तविक खपत में अंतर समझना होगा आसान
GDP के आकलन में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि लोगों ने कुल कितने रुपये खर्च किए। यह समझना भी जरूरी है कि खर्च में बढ़ोतरी वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ने से हुई है या लोगों ने वास्तव में ज्यादा वस्तुओं और सेवाओं का इस्तेमाल किया है।
बेहतर मूल्य सूचकांकों की मदद से मौजूदा कीमतों पर हुए खर्च और महंगाई के प्रभाव को अलग करने में सहायता मिल सकती है। इससे वास्तविक उपभोग में आए बदलावों की बेहतर तस्वीर सामने आ सकती है।
राज्यवार निजी उपभोग व्यय का अनुमान तैयार करने के लिए पारिवारिक उपभोग सर्वेक्षण, जनसंख्या अनुमान और वित्तीय सेवाओं से जुड़े आंकड़ों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।
UPI डेटा से मापी जाएगी सेवा क्षेत्र की गतिविधि
GDP के आकलन के साथ सेवा क्षेत्र की निगरानी के लिए भी नई व्यवस्था प्रस्तावित है। मंत्रालय की योजना के तहत UPI लेन-देन के आंकड़ों और सरकारी वेतन रिकॉर्ड का उपयोग निजी स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, अस्पतालों, स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी विभागों की गतिविधियों को समझने के लिए किया जा सकता है।
भारत में औद्योगिक गतिविधियों की निगरानी के लिए औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) उपलब्ध है, लेकिन सेवा क्षेत्र की गतिविधियों को व्यापक रूप से मापने के लिए मासिक स्तर पर समग्र आधिकारिक सूचकांक की जरूरत महसूस की जाती रही है।
प्रस्तावित सेवा उत्पादन सूचकांक (ISP) में UPI और वेतन संबंधी आंकड़े शामिल करने से इसके दायरे को बढ़ाने की योजना है। उपलब्ध मसौदे के अनुसार, कवरेज को सेवा क्षेत्र के सकल मूल्य वर्धन (GVA) के लगभग 60 प्रतिशत से बढ़ाकर करीब 78 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य है।
अर्थव्यवस्था की तस्वीर पर क्या होगा असर?
इन बदलावों से सरकार और नीति निर्माताओं को उपभोग, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सेवाओं से जुड़ी गतिविधियों का अधिक विस्तृत आकलन करने में मदद मिल सकती है। इससे आर्थिक नीतियां तैयार करने और विभिन्न क्षेत्रों में मांग के रुझानों को समझने के लिए बेहतर आंकड़े उपलब्ध हो सकते हैं।
हालांकि, ये प्रस्तावित बदलाव हैं। इनके वास्तविक प्रभाव का आकलन नई व्यवस्था लागू होने और आंकड़े जारी होने के बाद ही किया जा सकेगा।