भारत सरकार स्टील उद्योग से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए बड़ा कदम उठाने जा रही है। इसके तहत 5 हजार करोड़ रुपये (570 मिलियन डॉलर) का विशेष फंड तैयार किया गया है, जो इस्पात कंपनियों को उत्सर्जन घटाने के लिए प्रोत्साहन (Incentive) देगा। यह योजना खासतौर पर छोटे और मध्यम स्तर के स्टील प्लांट्स पर केंद्रित होगी, क्योंकि देश में इनकी संख्या सबसे अधिक है और प्रदूषण का बड़ा हिस्सा यहीं से निकलता है।
क्यों ज़रूरी है स्टील सेक्टर में प्रदूषण कम करना?
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्टील उत्पादक देश है। देश में लगातार बढ़ते इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और हाउसिंग सेक्टर की वजह से स्टील की मांग तेज़ी से बढ़ रही है। इस मांग को पूरा करने के लिए कई छोटे स्टील प्लांट्स लगाए गए हैं, जिन्हें शुरू करना आसान तो है, लेकिन ये वातावरण को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। स्टील उत्पादन के दौरान बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं। यही वजह है कि इस सेक्टर से होने वाला प्रदूषण रोकना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। अगर इस पर नियंत्रण नहीं पाया गया तो भारत का 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य अधूरा रह सकता है।
योजना का फोकस: छोटे और सेकेंडरी प्लांट्स
स्टील मंत्रालय के सचिव संदीप पाउंडरिक ने बताया कि यह योजना मुख्य रूप से सेकेंडरी प्लांट्स पर केंद्रित होगी, जहां अर्ध-परिष्कृत (Semi-refined), परिष्कृत (Refined) और तैयार उत्पाद (Finished Products) बनाए जाते हैं। इन छोटे प्लांट्स की उत्पादन क्षमता भले ही सीमित हो, लेकिन इनसे निकलने वाला प्रदूषण अपेक्षाकृत कहीं अधिक होता है। यही वजह है कि सरकार चाहती है कि इन्हें नई, आधुनिक और पर्यावरण-हितैषी तकनीकों से लैस किया जाए, ताकि ये न सिर्फ स्वच्छ ऊर्जा का इस्तेमाल करें बल्कि आने वाले वर्षों में भारत के नेट-जीरो उत्सर्जन मिशन को मजबूत करने में भी अहम योगदान दे सकें।
कैसे मिलेगा कंपनियों को इंसेटिव?
सरकार की इस योजना में डिकार्बोनाइजेशन (Carbon Reduction) के अलग-अलग स्तर पर कंपनियों को प्रोत्साहन दिया जाएगा। यानी जितना ज्यादा कोई कंपनी प्रदूषण कम करेगी, उतना ज्यादा इंसेटिव उसे मिलेगा। यह कदम न केवल पर्यावरण संरक्षण में मदद करेगा बल्कि कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार का रास्ता भी आसान बनाएगा। खासकर यूरोपीय संघ (EU) के साथ व्यापार के लिए यह ज़रूरी है, क्योंकि वहां कार्बन बॉर्डर टैक्स लागू है, जिसके तहत ज्यादा प्रदूषण वाले उत्पादों पर अतिरिक्त टैक्स लगाया जाता है।
भारत की ग्रीन स्टील की ओर बढ़ती राह
भारत सरकार पहले ही ग्रीन एनर्जी और नवीकरणीय स्रोतों के उपयोग पर ज़ोर दे रही है। अब स्टील सेक्टर में यह नई पहल दर्शाती है कि सरकार ग्रीन स्टील (Green Steel) की ओर तेजी से बढ़ना चाहती है। इससे भविष्य में स्टील उत्पादन न सिर्फ पर्यावरण-हितैषी होगा, बल्कि भारतीय कंपनियों की ग्लोबल मार्केट में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी। ग्रीन स्टील का उत्पादन उन देशों में निर्यात के लिए भी मददगार होगा, जहां सख्त पर्यावरण नियम लागू हैं।
रोजगार और नई तकनीक का रास्ता
विशेषज्ञों का मानना है कि इस योजना से न केवल प्रदूषण घटेगा, बल्कि नई तकनीकों के उपयोग से स्टील उद्योग में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। प्रदूषण कम करने वाली मशीनरी, तकनीकी उन्नयन और रिसर्च पर खर्च करने के लिए कंपनियों को सरकार का सहयोग मिलेगा। भारत सरकार का 5 हजार करोड़ रुपये (570 मिलियन डॉलर) का यह कार्यक्रम न सिर्फ स्टील सेक्टर को पर्यावरण के अनुकूल बनाएगा बल्कि देश को नेट जीरो मिशन 2070 के लक्ष्य के करीब भी ले जाएगा। छोटे और मध्यम स्टील प्लांट्स पर फोकस करने से प्रदूषण का स्तर तेजी से घट सकता है। इसके साथ यह योजना उद्योग जगत को ग्रीन स्टील की दिशा में आगे बढ़ने और वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने का बड़ा मौका देगी।