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The Industrial Empire - उद्योग, व्यापार और नवाचार की दुनिया | The World of Industry, Business & Innovation > फार्मा > साल 2030 तक रेबीज से जीरो डेथ का मिशन: जानें क्यों यह लड़ाई जरूरी है?
फार्मा

साल 2030 तक रेबीज से जीरो डेथ का मिशन: जानें क्यों यह लड़ाई जरूरी है?

Last updated: 04/07/2025 6:50 PM
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Industrial Empire
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भारत में हर साल हजारों लोग कुत्ते या अन्य जानवरों के काटने के बाद रेबीज जैसी जानलेवा बीमारी का शिकार बनते हैं। लेकिन अब सरकार और स्वास्थ्य संस्थाएं इस खतरे को जड़ से खत्म करने की दिशा में गंभीर हो गई हैं। Indian Council of Medical Research (ICMR) और National Institute of Epidemiology (NIE), चेन्नई की हालिया रिपोर्ट में इस बीमारी से जुड़ी कई चौंकाने वाली सच्चाइयों का खुलासा हुआ है, जिससे ये समझना आसान हो जाता है कि समय रहते बचाव संभव है।

हर साल 5700 जानें, और लाखों बाइट केस
ICMR-NIE की रिपोर्ट बताती है कि भारत में हर साल करीब 5700 लोगों की मौत रेबीज की वजह से होती है। इसके अलावा जानवरों के काटने के 90 लाख से अधिक मामले हर साल दर्ज होते हैं, जिनमें से लगभग दो-तिहाई कुत्तों से जुड़े होते हैं। लेकिन इन आंकड़ों से भी ज्यादा चिंता की बात ये है कि बड़ी संख्या में लोग इन बाइट्स को हल्के में लेते हैं और समय पर इलाज नहीं करवाते।

हाल की ही एक घटना है जिसे सुनकर सभी हैरान रह गए। दरअसल यह घटना यूपी के फराना गांव की है जहां 22 वर्षीय कबड्डी प्लेयर बृजेश सोलंकी की मौत रेबीज की वजह से हो जाती है। करीब ढाई महीने पहले बृजेश ने एक कुत्ते के बच्चे को गहरी नाली से बचाया था, उसी समय उसका दांत बृजेश के हाथ में लग जाता है। हल्का कट समझकर बृजेश इसे अनदेखा कर देता है जिसका खामियाजा अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है। अपने प्री-कबड्डी लीग की तैयारी के समय उसे अपने हाथ में सुन्नपन महसूस होता है। जिसके ट्रीटमेंट के लिए वो इधर-उधर भागते रहे और अंत में उसकी मौत हो गई थी।

ग्रामीण भारत सबसे ज्यादा प्रभावित
रिपोर्ट के अनुसार, रेबीज से होने वाली मौतों का बड़ा हिस्सा ग्रामीण इलाकों से आता है। वहां आज भी लोगों में जागरूकता की भारी कमी है और स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच सीमित है। बहुत से लोग यह तक नहीं जानते कि कुत्ते के काटने के बाद क्या करना चाहिए या कब और कैसे एंटी-रेबीज वैक्सीन लगवाना है।

100 फीसदी रोकी जा सकने वाली बीमार
NIE चेन्नई के डायरेक्टर डॉ. मनोज मुरहेकर कहते हैं कि रेबीज एक ऐसी बीमारी है जो यदि समय रहते पहचान ली जाए, तो इसे पूरी तरह रोका जा सकता है। कुत्ते के काटने के तुरंत बाद घाव को साफ करना और तय समय पर वैक्सीन लगवाना जीवन रक्षक हो सकता है। लेकिन लापरवाही, अज्ञानता, झाड़-फूंक और देसी उपायों पर विश्वास इस खतरे को और गहरा बना देता है।

सरकार का संकल्प: 2030 तक एक भी मौत नहीं
भारत सरकार ने WHO के साथ मिलकर 2030 तक रेबीज से “जीरो डेथ” का लक्ष्य रखा है। इसके लिए राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान चल रहे हैं, खासकर स्कूलों, पंचायतों और गांवों में। पालतू और आवारा कुत्तों का टीकाकरण भी इस अभियान का बड़ा हिस्सा है।

हर नागरिक की भूमिका जरूरी
रेबीज से बचाव केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। हमें खुद भी जानवरों के व्यवहार, टीकाकरण और उपचार से जुड़ी बुनियादी जानकारी रखनी चाहिए। सही समय पर सही कदम उठाकर इस बीमारी को न केवल रोका जा सकता है बल्कि खत्म भी किया जा सकता है। 2030 दूर नहीं है लेकिन जागरूकता फैलाना और जिम्मेदारी निभाना आज से शुरू करना होगा।

TAGGED:Indian Council of Medical ResearchIndustrial EmpireNational Institute of Epidemiologyrabiesvaccination
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