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The Industrial Empire - उद्योग, व्यापार और नवाचार की दुनिया | The World of Industry, Business & Innovation > फर्श से अर्श तक > भट्ठी का बेटा: जब्बार अली की बोतल क्रांति
फर्श से अर्श तक

भट्ठी का बेटा: जब्बार अली की बोतल क्रांति

Last updated: 12/07/2025 6:09 PM
By
Industrial empire correspondent
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फिरोजाबाद। “अब्बा कहते थे – बोतल नहीं, रोटी सोचो… पर मैंने दोनों साथ लाने की ठान ली थी।” ये बात कही जब्बार अली ने जो मायरा ग्लास पैकेजिंग के फाउंडर है।

फिरोज़ाबाद की तंग गलियों में एक लड़का पला जिसने भट्ठी की आंच में बचपन गलाया और आज उसकी बनाई बोतलें दुबई और सिंगापुर तक जाती हैं। उसका नाम – जब्बार अली। पहचान – “मायरा ग्लास पैकेजिंग” का संस्थापक। मकसद – कांच को सिर्फ काटने की नहीं, संवारने की चीज़ बनाना।

शुरुआत: राख से रोटी तक
टप्पल मोहल्ला, फिरोज़ाबाद। छोटा सा कमरा, कच्ची छत और पिता – हाजी सलीम एक चूड़ी भट्ठी में दिहाड़ी मज़दूर थे। जब्बार कहते हैं – “पहली बार सात साल की उम्र में भट्ठी में हाथ लगाया… और जला भी। पर वहीं से जलने की आदत लग गई।” स्कूल छुट्टी से ज़्यादा हाजिरी की जगह था। मां अक्सर बीमार रहतीं और पेट में अक्सर खालीपन होता। पर उस खालीपन में एक सपना उगा – कुछ अलग करने का।

टूटी शीशी में दिखा सपना
उनके पड़ोस में एक बूढ़ा बंगाली कारीगर, मोहन दा, इत्र की बोतलें बनाता था। जब्बार रोज़ घूरते थे उसे – कांच को पिघलाकर कैसे नाज़ुक शीशियां बनाता है। एक दिन उसने एक टूटी शीशी जब्बार को दी। “उस शीशी में पहली बार मैंने खुद को कुछ बनने लायक देखा।” यही क्षण था, जिसने राह बना दी।

पहला दांव: लॉकडाउन में 12 बोतलें
कोविड लॉकडाउन 2020 में सब कुछ बंद था। जब्बार ने एक दोस्त से 2000 रुपये उधार लिए। एक पुराना मोल्ड, थोड़ी बालू, एक लोहे की टंकी और छत पर एक देसी भट्ठी तैयार की। 48 घंटे में उन्होंने 12 परफ्यूम की बोतलें बनाई, लोग हँसे। परिवार डरा। पर वो 12 बोतलें, उनके लिए उम्मीद थीं – “not glass, but grit”.

पहला ऑर्डर: चांदनी चौक का सरप्राइज़
दिल्ली पहुँचे। 11 दुकानदारों ने भगा दिया। 12वें – अज़ीज़ एंटरप्राइज़ेस, चांदनी चौक ने पूछ – “500 बोतलें बना सकते हो अगले महीने?” वहीं से सफर शुरू हुआ।

मायरा ग्लास की नींव
साल 2021 में जब्बार ने अपनी बेटी के नाम पर कंपनी का नाम “मायरा ग्लास पैकेजिंग” रखकर काम शुरू किया।

साल 2022 तक:
4 मज़दूर
2 देसी भट्टियां
एक ग्राहक

2025 में:
140 कर्मचारी
3 मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स
1.8 लाख बोतलें हर महीने
क्लाइंट्स: UAE, सिंगापुर, आयुर्वेद ब्रांड्स, इंडी परफ्यूम स्टार्टअप्स

“मैं मशीन से नहीं, मज़दूर से चलता हूं”
जब्बार आज भी हर सुबह फैक्ट्री में सबसे पहले पहुंचते हैं। मज़दूरों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस, बच्चों की पढ़ाई और आपातकालीन फंड चलाते हैं। “मैं खुद मज़दूर का बेटा हूं। उन्हें मालिक नहीं, साथी चाहिए।” 2023 की गैस सप्लाई बंदी में, जब फैक्ट्री बंद रही तब भी एक मज़दूर की तनख्वाह नहीं रुकी।

चुनौतियां
फंडिंग नहीं थी,
बैंक ने लोन रिजेक्ट किया,
तकनीकी जानकारी सिर्फ “देख कर सीखी”,
लोकल लॉबी ने नई यूनिट का विरोध किया,
लेकिन जब्बार की ज़िद बड़ी थी।

अगर नींद की कुर्बानी दे सको, तो सपने जरूर पूरे होंगे।

युवाओं के लिए एक सलाह
“कोई आइडिया छोटा नहीं होता। अपने हाथ से बनी पहली चीज़ को कभी मत बेचो, पहले उसे इज़्ज़त दो। तभी दुनिया उसे मोल देगी।”

सीखने लायक बातें
छोटे शहर में भी बड़ा सपना देखा जा सकता है,
देसी तरीके से शुरुआत हो सकती है,
मज़दूर की सोच भी मालिक की बन सकती है,
परंपरा और इनोवेशन साथ चल सकते हैं |

लेखक की टिप्पणी
यह कहानी सिर्फ एक उद्यमी की नहीं, हर उस युवा की है जो सोचता है कि साधन नहीं हैं, तो सपने नहीं होंगे। जब्बार अली ने ये साबित कर दिया कि भट्ठी में जलने वाला लड़का भी, दुनिया के इत्र बाजार को बोतलें दे सकता है।

अगर आपको यह कहानी प्रेरक लगी हो, तो इसे शेयर करें। ऐसी और कहानियों के लिए पढ़ें Industrial Empire के “फर्श से अर्श तक” सेगमेंट को।

TAGGED:BhattiKaBetaFirozabadEntrepreneurIndianStartupStoryIndustrial EmpireJabbarAliStoryMake in IndiaMyraGlassPackaging
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