रक्षाबंधन का त्योहार इस बार भाई-बहन के प्रेम और रिश्तों के साथ-साथ स्वदेशी उत्पादों और आत्मनिर्भर भारत की भावना को भी मजबूती देता नजर आ रहा है। देशभर के बाजारों में भारतीय कारीगरों और स्थानीय कारोबारियों द्वारा तैयार की गई राखियों की मांग बढ़ी है। अलग-अलग राज्यों में तैयार की गई पारंपरिक और डिजाइनर राखियां ग्राहकों को आकर्षित कर रही हैं।
कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के मुताबिक, इस वर्ष रक्षाबंधन के मौके पर देशभर में करीब 25 हजार करोड़ रुपये के राखी कारोबार का अनुमान है। यह पिछले साल के करीब 17 हजार करोड़ रुपये के कारोबार की तुलना में लगभग 45 फीसदी अधिक है। उपहार, मिठाई, कपड़े और अन्य त्योहारी सामान को शामिल किया जाए तो कुल कारोबार 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक पहुंचने का अनुमान है।
वर्ष 2023 में राखी का कारोबार करीब 12 हजार करोड़ रुपये रहा था। इस लिहाज से पिछले कुछ वर्षों में रक्षाबंधन से जुड़े कारोबार में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।
स्वदेशी राखियों पर बढ़ा जोर
कैट के अनुसार, इस वर्ष देशभर के बाजारों में स्वदेशी राखियों को लेकर ग्राहकों और कारोबारियों का रुझान मजबूत है। व्यापारिक संगठनों का दावा है कि चीनी राखियों की मांग बेहद कम है और बाजार में भारतीय निर्मित राखियों को प्राथमिकता दी जा रही है।
कैट देश के अलग-अलग शहरों में स्वदेशी मेले आयोजित करने की तैयारी कर रहा है। इन मेलों में महिला उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय कारीगरों द्वारा तैयार राखियों और अन्य उत्पादों को बिक्री के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। इससे छोटे कारोबारियों और घरेलू स्तर पर काम करने वाले उत्पादकों को सीधे बाजार तक पहुंच बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
महिला उद्यमियों और स्थानीय कारीगरों को फायदा
स्वदेशी उत्पादों के प्रति बढ़ते रुझान से महिला व्यापारियों, कारीगरों, लघु उद्योगों और स्थानीय दुकानदारों को आर्थिक फायदा मिलने की उम्मीद है। “वोकल फॉर लोकल” जैसी पहल के कारण ग्राहक स्थानीय स्तर पर बने उत्पादों को खरीदने पर जोर दे रहे हैं।
राखी बाजार में पारंपरिक धागों से लेकर आकर्षक डिजाइन, बच्चों के लिए कार्टून कैरेक्टर और लाइट वाली राखियों तक कई तरह के विकल्प मौजूद हैं। अलग-अलग आय वर्ग के ग्राहकों के लिए 4 रुपये से लेकर 100 रुपये तक की राखियां उपलब्ध हैं।
बच्चों में लाइट वाली राखियों का क्रेज
मुंबई के धारावी इलाके के राखी कारोबारी हरमुख लाल पटवा के मुताबिक, बाजार में कोलकाता और दिल्ली से भी राखियां पहुंच रही हैं। ग्राहकों की पसंद में बदलाव देखने को मिल रहा है और बच्चों के बीच लाइट वाली राखियों की मांग बनी हुई है।
कारोबारियों के अनुसार, राखी का सीजन सीमित अवधि का होता है, इसलिए मांग का सही अनुमान लगाना सबसे बड़ी चुनौती है। डिजाइन और ट्रेंड तेजी से बदलने के कारण ज्यादा स्टॉक बच जाने पर अगले साल उसे बेच पाना मुश्किल हो सकता है।
स्टॉक मैनेजमेंट कारोबारियों के लिए चुनौती
राखी उत्पादक गंगादीन पटवा ने बताया कि राखी का कारोबार कुछ ही दिनों तक चलता है। ऐसे में उत्पादन और स्टॉक का सही आकलन बेहद जरूरी है। मांग से अधिक उत्पादन होने पर बचा हुआ माल लंबे समय तक रखना पड़ता है। अगले सीजन तक डिजाइन और ग्राहकों की पसंद बदल जाने से पुराने स्टॉक की बिक्री प्रभावित हो सकती है।
राखी व्यापारी मंगल जैन के मुताबिक, कच्चे माल और कारीगरों की मजदूरी बढ़ने से राखी बनाने की लागत भी बढ़ी है। ऐसे में कारोबारियों के लिए मांग के हिसाब से स्टॉक रखना जरूरी हो गया है।
सोने-चांदी की राखियों की भी मांग
रक्षाबंधन के बाजार में हल्की सोने और चांदी की राखियों का चलन भी बढ़ रहा है। ज्वेलरी मेकर वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष संजय शाह के मुताबिक, सोने-चांदी को निवेश के लिहाज से बेहतर विकल्प मानने वाले कुछ ग्राहक त्योहार पर हल्की राखियों को पसंद कर रहे हैं।
इन राखियों को ग्राहक बाद में आभूषण के तौर पर भी इस्तेमाल कर सकते हैं। कई ग्राहक ऐसी राखियों के लिए पहले से ऑर्डर देकर उन्हें अपनी पसंद के डिजाइन में तैयार करा रहे हैं।
त्योहार के अंतिम दिनों में बिक्री बढ़ने की उम्मीद
कारोबारियों को उम्मीद है कि रक्षाबंधन से ठीक पहले के अंतिम दिनों में बाजार में खरीदारी तेज होगी। हालांकि, इस बार त्योहार महीने के अंत में पड़ने के कारण कुछ परिवारों के बजट पर दबाव रह सकता है। इसके बावजूद कारोबारियों का मानना है कि रक्षाबंधन भावनाओं से जुड़ा त्योहार है और लोग भाई-बहन के लिए खरीदारी को प्राथमिकता देते हैं।
कुल मिलाकर, इस रक्षाबंधन स्वदेशी राखियों की बढ़ती मांग स्थानीय कारीगरों, महिला उद्यमियों और छोटे व्यापारियों के लिए नए अवसर लेकर आई है। साथ ही, करीब 25 हजार करोड़ रुपये के राखी कारोबार का अनुमान त्योहार से जुड़े बाजार की मजबूत होती आर्थिक गतिविधियों को दर्शाता है।