भारत के कॉर्पोरेट इतिहास में कुछ कहानियां ऐसी हैं, जो सफलता के शिखर से गिरकर बर्बादी की गहराई तक पहुंचने का बड़ा उदाहरण बन जाती हैं। Videocon Group की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक समय था जब यह कंपनी हर भारतीय घर का हिस्सा हुआ करती थी—टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन और एसी जैसे प्रोडक्ट्स के जरिए। इसकी वैल्यू करीब 50 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गई थी, लेकिन आज यही कंपनी कर्ज, दिवालिया प्रक्रिया और कानूनी संकटों में फंसी हुई है।
शुरुआत से शिखर तक का सफर
1980 से लेकर 2000 के दशक तक Videocon Group भारत के सबसे भरोसेमंद ब्रांड्स में गिना जाता था। कंपनी ने कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स सेगमेंट में शानदार पकड़ बनाई और तेजी से विस्तार किया। उस दौर में मध्यम वर्ग के लिए Videocon एक भरोसे का नाम था। इसके प्रोडक्ट्स गुणवत्ता और कीमत दोनों में संतुलित माने जाते थे, जिससे कंपनी ने देशभर में अपनी मजबूत पहचान बना ली।
विस्तार की दौड़ और बढ़ता कर्ज
समस्या तब शुरू हुई जब कंपनी ने अपने कोर बिजनेस से बाहर निकलकर कई अन्य सेक्टर्स में तेजी से विस्तार करना शुरू किया। Venugopal Dhoot के नेतृत्व में समूह ने टेलीकॉम, तेल और गैस जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश किए। इन प्रोजेक्ट्स के लिए बैंकों से भारी कर्ज लिया गया। धीरे-धीरे यह कर्ज बढ़ते-बढ़ते करीब 40 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
कर्ज लेना खुद में समस्या नहीं होती, लेकिन जब उससे मिलने वाला रिटर्न उम्मीद के मुताबिक न हो, तो यह भारी बोझ बन जाता है। Videocon के साथ भी यही हुआ। जिन प्रोजेक्ट्स में कंपनी ने निवेश किया, वे उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं हो पाए।
मोजाम्बिक प्रोजेक्ट और टेलीकॉम की असफलता
Videocon Group ने अफ्रीका के मोजाम्बिक में तेल ब्लॉक्स खरीदने के लिए भारी निवेश किया, लेकिन यह प्रोजेक्ट सफल नहीं हुआ। इससे कंपनी को बड़ा वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा। दूसरी ओर, टेलीकॉम सेक्टर में भी कंपनी को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।
जब Reliance Jio ने बाजार में एंट्री की, तो पूरे टेलीकॉम सेक्टर की तस्वीर बदल गई। सस्ते डेटा और आक्रामक रणनीति के चलते कई कंपनियां इस प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाईं, और Videocon भी उनमें से एक थी।
बैंकिंग विवाद और साख पर असर
Videocon Group को सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब Chanda Kochhar से जुड़ा लोन विवाद सामने आया। आरोप लगा कि ICICI बैंक से लोन दिलाने में अनियमितताएं हुईं। इस मामले की जांच शुरू हुई और प्रवर्तन निदेशालय ने भी इसमें हस्तक्षेप किया।
इस विवाद ने कंपनी की साख को गहरा नुकसान पहुंचाया। निवेशकों और बैंकों का भरोसा कमजोर हो गया, जिससे कंपनी के लिए फंडिंग और भी मुश्किल हो गई।
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दिवालिया प्रक्रिया और बैंकों का नुकसान
2018 में Videocon Group के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू की गई। National Company Law Tribunal (NCLT) में मामला गया और कंपनी की संपत्तियों को बेचकर कर्ज वसूली की प्रक्रिया शुरू हुई।
इस दौरान बैंकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। रिपोर्ट्स के अनुसार, बैंकों को अपने कर्ज का करीब 90 प्रतिशत तक हेयरकट लेना पड़ा, यानी उन्हें बहुत कम पैसा वापस मिला। यह भारत के सबसे बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्ट मामलों में से एक बन गया।
धूत की निजी संपत्तियां भी खतरे में
इस मामले में सबसे खास बात यह रही कि Venugopal Dhoot ने कर्ज के लिए पर्सनल गारंटी दी थी। इसी वजह से State Bank of India (SBI) ने उनके खिलाफ भी कार्रवाई शुरू की।
अब NCLT ने धूत के खिलाफ पर्सनल इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया को मंजूरी दे दी है। इसका मतलब है कि उनकी निजी संपत्तियां—जैसे घर, गाड़ियां, बैंक बैलेंस और निवेश—बेचकर करीब 8 हजार करोड़ रुपये की वसूली की जाएगी।
बिजनेस में संतुलन जरूरी
Videocon की यह कहानी सिर्फ एक कंपनी की नहीं, बल्कि पूरे बिजनेस जगत के लिए एक बड़ा सबक है। यह दिखाती है कि कैसे तेजी से विस्तार, ज्यादा कर्ज और गलत निवेश किसी भी मजबूत कंपनी को कमजोर बना सकते हैं।
बिजनेस में संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। कोर बिजनेस पर ध्यान देना, जोखिम का सही आकलन करना और पारदर्शिता बनाए रखना सफलता के लिए जरूरी होता है।
सफलता से बर्बादी तक का सफर
Videocon Group का पतन इस बात का उदाहरण है कि सफलता को बनाए रखना उतना ही कठिन है, जितना उसे हासिल करना।
एक समय का मार्केट लीडर आज कर्ज और कानूनी संकटों में घिरा हुआ है। Venugopal Dhoot की कहानी यह सिखाती है कि गलत फैसले और लालच किसी भी बड़े साम्राज्य को खत्म कर सकते हैं।
यह कहानी हर बिजनेस और निवेशक के लिए एक चेतावनी है—सिर्फ तेजी से बढ़ना ही सफलता नहीं है, बल्कि सही दिशा में और संतुलन के साथ बढ़ना ही असली जीत है।
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