नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और महंगे कच्चे तेल ने दुनियाभर में महंगाई की चिंता बढ़ा दी है। इसके चलते केंद्रीय बैंकों की ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कमजोर पड़ रही है। बाजार में अब लंबे समय तक ऊंची दरें बने रहने की आशंका है, जिसका असर बॉन्ड मार्केट, कंपनियों की लागत और शेयर बाजार पर पड़ सकता है।
जेफरीज और विभिन्न म्यूचुअल फंड हाउसों की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका, जापान और भारत सहित कई देशों में महंगाई के दबाव के बीच मौद्रिक नीति को लेकर सतर्कता बढ़ी है। भारत में भी ब्याज दरों, बॉन्ड यील्ड और महंगाई के रुख पर निवेशकों की नजर बनी हुई है।
ऊंची ब्याज दरों की आशंका क्यों बढ़ी?
महंगे तेल से परिवहन और उत्पादन की लागत बढ़ सकती है। इसका असर वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पड़ता है। ऐसे में केंद्रीय बैंकों के लिए महंगाई को नियंत्रित करना चुनौती बन जाता है। अमेरिका में महंगाई लंबे समय से फेडरल रिजर्व के 2 फीसदी लक्ष्य से ऊपर रहने की चिंता बनी हुई है। वहीं, जापान में भी आगे ब्याज दरें बढ़ने की संभावना जताई गई है।
भारत में रिजर्व बैंक के नीतिगत रुख और भविष्य की दरों को लेकर बाजार सतर्क है। हालांकि, ब्याज दरों में वास्तविक बदलाव केंद्रीय बैंक के फैसलों और महंगाई के आंकड़ों पर निर्भर करेगा।
बॉन्ड यील्ड में तेजी से निवेशकों की चिंता
ब्याज दरें बढ़ने की आशंका का असर सरकारी बॉन्ड की यील्ड पर भी दिखता है। बॉन्ड यील्ड बढ़ने पर पहले जारी किए गए निश्चित ब्याज वाले बॉन्ड की बाजार कीमत आमतौर पर घटती है। इससे पुराने बॉन्ड में निवेश करने वालों को नुकसान हो सकता है, जबकि नए निवेशकों को अपेक्षाकृत बेहतर यील्ड का अवसर मिल सकता है।
एक्सिस म्यूचुअल फंड की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड अगस्त से अक्टूबर के बीच 6.78 फीसदी से बढ़कर 7.21 फीसदी हो गई। रिपोर्ट में आगे भी यील्ड ऊंची रहने की आशंका जताई गई है। सरकारी बॉन्ड की अतिरिक्त आपूर्ति और राज्यों की उधारी भी यील्ड पर दबाव डाल सकती है।
महंगाई और विकास के बीच संतुलन की चुनौती
भारत के सामने महंगे कच्चे तेल और मौसम संबंधी जोखिमों की चुनौती है। तेल की कीमतें बढ़ने से आयात बिल और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। अगर रुपया कमजोर होता है, तो आयात की लागत और बढ़ सकती है। महंगाई पर नियंत्रण के लिए सख्त मौद्रिक नीति अपनाने से कर्ज महंगा होने और खर्च की रफ्तार धीमी पड़ने का जोखिम भी रहता है।
दूसरी ओर, बैंक कर्ज और औद्योगिक वित्तपोषण में बढ़ोतरी आर्थिक गतिविधियों को सहारा दे सकती है। ऐसे में नीति निर्माताओं के लिए महंगाई नियंत्रित करने और विकास की गति बनाए रखने के बीच संतुलन जरूरी होगा।
शेयर बाजार पर क्या होगा असर?
ऊंची ब्याज दरों से कंपनियों की कर्ज लेने की लागत बढ़ सकती है। इससे उनके मुनाफे और भविष्य की कमाई पर असर पड़ने की आशंका रहती है। इसके अलावा, सरकारी बॉन्ड में बेहतर यील्ड मिलने पर कुछ निवेशक शेयरों के बजाय बॉन्ड में पैसा लगाने पर विचार कर सकते हैं।
हालांकि, मजबूत कमाई वाली कंपनियों के शेयरों को बाजार में सहारा मिल सकता है। जेफरीज के अनुमानों में भारतीय कंपनियों की कमाई में आगे वृद्धि की उम्मीद जताई गई है। इसके बावजूद महंगे मूल्यांकन वाले शेयरों में उतार-चढ़ाव का जोखिम बना रह सकता है।
कुल मिलाकर, आने वाले समय में महंगाई, कच्चे तेल की कीमतें, केंद्रीय बैंकों के फैसले और कंपनियों के वित्तीय नतीजे बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। निवेशकों के लिए जरूरी होगा कि वे केवल ब्याज दरों के अनुमान के आधार पर फैसला लेने के बजाय जोखिम और निवेश अवधि को भी ध्यान में रखें।