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बिहार के नए microfinance law से हिले स्मॉल फाइनेंस बैंक शेयर, ₹57,000 करोड़ के बाजार पर असर

Last updated: 27/02/2026 3:40 PM
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Industrial empire correspondent
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बिहार माइक्रोफाइनेंस कानून के बाद स्मॉल फाइनेंस बैंक शेयरों में गिरावट का संकेत देता ग्राफ
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भारत के माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में एक बड़े नीतिगत बदलाव ने निवेशकों और बाजार को सतर्क कर दिया है। बिहार सरकार द्वारा पारित नए माइक्रोफाइनेंस नियमन कानून (microfinance law) के बाद शुक्रवार को स्मॉल फाइनेंस बैंकों (SFB) के शेयरों में तेज गिरावट देखने को मिली। यह गिरावट उस समय आई जब व्यापक बाजार में कमजोरी सीमित थी, जिससे स्पष्ट संकेत मिला कि निवेशकों की चिंता खास तौर पर माइक्रोफाइनेंस कारोबार से जुड़े जोखिमों को लेकर है।

शेयर बाजार में दबाव: किन बैंकों पर सबसे ज्यादा असर
कारोबार के दौरान उत्कर्ष स्मॉल फाइनेंस बैंक के शेयर करीब 3.7% तक टूट गए। इक्विटास और जना स्मॉल फाइनेंस बैंक में लगभग 2.5% की गिरावट दर्ज की गई, जबकि उज्जीवन स्मॉल फाइनेंस बैंक और एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक के शेयर भी 1–1.3% तक नीचे रहे।

दिलचस्प बात यह है कि उसी समय बीएसई सेंसेक्स में केवल लगभग 0.47% की हल्की गिरावट थी। इसका मतलब है कि बाजार की सामान्य कमजोरी के मुकाबले माइक्रोफाइनेंस-केंद्रित बैंकों पर दबाव ज्यादा रहा। निवेशकों ने साफ संकेत दिया कि बिहार के नए कानून से इन संस्थानों के बिजनेस मॉडल पर असर पड़ सकता है।

क्या है बिहार का नया माइक्रोफाइनेंस कानून
बिहार विधानसभा ने “बिहार माइक्रो फाइनेंस संस्थान (मनी लेंडिंग का नियमन और जबरन वसूली की रोकथाम) विधेयक, 2026” पारित किया है। इस कानून का उद्देश्य माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की गतिविधियों को नियंत्रित करना और उधारकर्ताओं के साथ होने वाली कथित जबरन वसूली जैसी समस्याओं को रोकना है। नए नियमों के तहत माइक्रोफाइनेंस संस्थानों को राज्य में ऋण वितरण शुरू करने से पहले राज्य सरकार के वित्त विभाग से अनुमति लेनी होगी। यहां तक कि जिन कंपनियों के पास पहले से भारतीय रिजर्व बैंक का लाइसेंस है, उन्हें भी बिहार में अलग से पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा।

सरकार ने “डायरेक्टर ऑफ इंस्टीट्यूशनल फाइनेंस” को नोडल अधिकारी बनाया है, और आरबीआई लाइसेंस मिलने के 90 दिनों के भीतर राज्य पंजीकरण की शर्त रखी गई है। सरकार का तर्क है कि इससे क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी।

निवेशकों की चिंता: लोन ग्रोथ और मुनाफे पर असर का डर
विश्लेषकों के अनुसार सबसे बड़ी चिंता यह है कि राज्य स्तर की अनुमति प्रक्रिया से ऋण वितरण की गति धीमी हो सकती है। माइक्रोफाइनेंस कारोबार तेजी से छोटे-छोटे बिना गारंटी वाले कर्ज देने पर आधारित होता है। अगर हर राज्य में अलग नियमन और अनुमति की जरूरत पड़ी, तो संचालन लागत और समय दोनों बढ़ सकते हैं।

इसका सीधा असर लोन ग्रोथ, ग्राहक विस्तार और अंततः मुनाफे पर पड़ सकता है। निवेशकों को यह भी डर है कि यदि अन्य राज्य भी बिहार जैसा कानून लाते हैं, तो माइक्रोफाइनेंस सेक्टर के पूरे बिजनेस मॉडल पर दबाव आ सकता है। विशेष रूप से वे स्मॉल फाइनेंस बैंक, जिनकी आय का बड़ा हिस्सा माइक्रोफाइनेंस से आता है या जिनकी मौजूदगी पूर्वी भारत में अधिक है, जोखिम के दायरे में माने जा रहे हैं।

बिहार: माइक्रोफाइनेंस का सबसे बड़ा केंद्र
माइक्रोफाइनेंस उद्योग के आंकड़ों के अनुसार बिहार इस क्षेत्र का सबसे बड़ा बाजार है। यहां 2.2 करोड़ से अधिक माइक्रोफाइनेंस खाते हैं और कुल बकाया ऋण लगभग ₹57,712 करोड़ के आसपास है। पूरे माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो में लगभग 40% हिस्सा एनबीएफसी-माइक्रोफाइनेंस कंपनियों का है, जबकि बैंक और स्मॉल फाइनेंस बैंक मिलकर करीब 50% हिस्सेदारी रखते हैं। इनमें स्मॉल फाइनेंस बैंकों का हिस्सा लगभग 15% माना जाता है। यानी बिहार जैसे बड़े बाजार में नीति परिवर्तन का असर पूरे सेक्टर की कमाई और ग्रोथ पर पड़ सकता है।

बदला है SFB का बिजनेस मॉडल, फिर भी जोखिम बरकरार
पिछले कुछ वर्षों में स्मॉल फाइनेंस बैंकों ने अपने कर्ज पोर्टफोलियो को विविध बनाने की कोशिश की है। बिना गारंटी वाले माइक्रोफाइनेंस लोन का हिस्सा वित्त वर्ष 2022 में करीब 35% था, जो 2025 तक घटकर लगभग 24% रह गया है। अब ये बैंक एमएसएमई लोन, गोल्ड लोन, वाहन ऋण और किफायती आवास ऋण जैसे क्षेत्रों में विस्तार कर रहे हैं। इससे जोखिम कम हुआ है, लेकिन माइक्रोफाइनेंस अभी भी आय का महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है। इसी वजह से बिहार जैसे बड़े राज्य में नियामकीय बदलाव का असर अभी भी इन बैंकों पर पड़ सकता है।

निवेश रणनीति: किन बैंकों में सावधानी, किनमें अवसर
विशेषज्ञों का मानना है कि जिन स्मॉल फाइनेंस बैंकों की माइक्रोफाइनेंस पर निर्भरता ज्यादा है, उनमें अल्पकालिक दबाव जारी रह सकता है। वहीं जिन बैंकों का पोर्टफोलियो अधिक विविध है, वे अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थिति में रह सकते हैं। निवेशकों को यह देखना चाहिए कि गिरावट केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया है या वास्तव में कारोबार पर दीर्घकालिक असर पड़ेगा। मजबूत पूंजी, विविध ऋण पोर्टफोलियो और बेहतर जोखिम प्रबंधन वाले बैंक लंबे समय में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।

क्या NBFC को भी मिलेगा यूनिवर्सल बैंक बनने का मौका
इसी बीच एक और महत्वपूर्ण नीति संकेत सामने आया है। रिपोर्ट्स के अनुसार वित्तीय सेवा विभाग बड़ी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) को यूनिवर्सल बैंक बनने की अनुमति देने पर विचार कर सकता है। संभावित प्रस्ताव के तहत ₹50,000 करोड़ या उससे अधिक परिसंपत्ति वाली NBFC को कुछ शर्तों—जैसे मुनाफा, बैड लोन स्तर और संचालन रिकॉर्ड के आधार पर बैंक बनने का अवसर मिल सकता है। अगर ऐसा होता है, तो बैंकिंग और माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है, जिससे स्मॉल फाइनेंस बैंकों पर दबाव और बढ़ सकता है।

नियमन बनाम ग्रोथ की नई चुनौती
बिहार का नया माइक्रोफाइनेंस कानून निवेशकों के लिए एक स्पष्ट संकेत है कि माइक्रोफाइनेंस सेक्टर अब अधिक नियमन के दौर में प्रवेश कर रहा है। इसका उद्देश्य भले ही उधारकर्ताओं की सुरक्षा और पारदर्शिता बढ़ाना हो, लेकिन इससे ऋण वितरण की गति और लाभप्रदता पर असर पड़ने की आशंका है। ₹57,000 करोड़ से अधिक के बिहार बाजार में बदलाव का प्रभाव केवल राज्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे स्मॉल फाइनेंस बैंकिंग सेक्टर की रणनीति को प्रभावित कर सकता है।

आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या अन्य राज्य भी इसी तरह के नियम लागू करते हैं। फिलहाल निवेशकों के लिए संदेश साफ है – माइक्रोफाइनेंस पर अत्यधिक निर्भर बैंकों में सतर्कता और विविध पोर्टफोलियो वाले संस्थानों में चयनात्मक अवसर।

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