भारत में ग्रीन हाइड्रोजन का क्षेत्र औद्योगिक विकास और कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिहाज से महत्वपूर्ण बनता जा रहा है। केयरएज रेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र 2030 तक 180 अरब से 200 अरब डॉलर तक का निवेश आकर्षित कर सकता है। इससे इस्पात, उर्वरक, रिफाइनिंग और रसायन उद्योगों को कम कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीक अपनाने में मदद मिल सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रीन हाइड्रोजन अब केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, निर्यात प्रतिस्पर्धा और औद्योगिक उत्पादन की लागत से भी जुड़ा है। खासतौर पर यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) के कारण भारतीय निर्यातकों के लिए उत्पादन के दौरान कार्बन उत्सर्जन कम करना जरूरी होता जा रहा है।
कार्बन उत्सर्जन से बढ़ सकती है निर्यात लागत
रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय इस्पात निर्यातकों को यूरोपीय संघ में निर्यात किए जाने वाले उत्पादों पर 70 से 190 डॉलर प्रति मीट्रिक टन तक अतिरिक्त लागत का सामना करना पड़ सकता है। कुछ मामलों में डिफॉल्ट उत्सर्जन मान लागू होने पर यह लागत 270 डॉलर प्रति मीट्रिक टन से अधिक हो सकती है। इससे कम उत्सर्जन वाले उत्पादन की जरूरत बढ़ेगी।
ग्रीन हाइड्रोजन की लागत बड़ी चुनौती
फिलहाल ग्रीन हाइड्रोजन की उत्पादन लागत लगभग 350 से 450 रुपये प्रति किलोग्राम बताई गई है, जबकि ग्रे हाइड्रोजन की लागत 160 से 200 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास है। नवीकरणीय ऊर्जा सस्ती होने और इलेक्ट्रोलाइजर तकनीक में सुधार से भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन की लागत घटने की उम्मीद है।
हालांकि, उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकारी सहायता, मजबूत बुनियादी ढांचे और उद्योगों से सुनिश्चित मांग की जरूरत होगी। लंबी अवधि के खरीद समझौते भी निवेशकों का भरोसा बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
सरकार का 50 लाख टन उत्पादन लक्ष्य
केंद्र सरकार ने जनवरी 2023 में 19,744 करोड़ रुपये के बजट के साथ राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन शुरू किया था। इसका लक्ष्य 2030 तक सालाना कम से कम 50 लाख मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता हासिल करना है। रिपोर्ट में फरवरी 2026 तक भारत की चालू उत्पादन क्षमता लगभग 8,000 टन सालाना बताई गई है। इससे लक्ष्य हासिल करने के लिए बड़े पैमाने पर परियोजनाओं को लागू करने की जरूरत स्पष्ट होती है।
रिलायंस और अदाणी की निवेश योजनाएं
ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र में बड़ी कंपनियां भी दिलचस्पी दिखा रही हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने एकीकृत ग्रीन एनर्जी इकोसिस्टम के लिए 75,000 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की है। वहीं, अदाणी एंटरप्राइजेज ने अगले दशक में ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र में 50 अरब डॉलर से अधिक निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। एनटीपीसी ने भी आंध्र प्रदेश में ग्रीन हाइड्रोजन हब स्थापित करने का प्रस्ताव दिया है।
निवेश के साथ बुनियादी ढांचा भी जरूरी
ग्रीन हाइड्रोजन के विस्तार के लिए इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा, भंडारण, परिवहन और बंदरगाह सुविधाओं में निवेश जरूरी होगा। इसके अलावा, परियोजनाओं की वित्तीय व्यवहार्यता और खरीदारों की उपलब्धता पर भी ध्यान देना होगा।
कुल मिलाकर, ग्रीन हाइड्रोजन भारत के उद्योगों को कम कार्बन उत्सर्जन वाला उत्पादन अपनाने और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का अवसर दे सकता है। हालांकि, 2030 तक की संभावनाओं को वास्तविक उपलब्धि में बदलने के लिए लागत घटाना, उत्पादन क्षमता बढ़ाना और मजबूत आपूर्ति व्यवस्था तैयार करना अहम होगा।