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The Industrial Empire - उद्योग, व्यापार और नवाचार की दुनिया | The World of Industry, Business & Innovation > केमिकल > कच्चे तेल की महंगाई का बोझ कौन उठा रहा है? ₹100 प्रति बैरल पर GDP का 1.7% तक खर्च
केमिकल

कच्चे तेल की महंगाई का बोझ कौन उठा रहा है? ₹100 प्रति बैरल पर GDP का 1.7% तक खर्च

Last updated: 24/10/2026 5:47 PM
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Manu Tiwari
ByManu Tiwari
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कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और सरकारी राहत पर दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद ईंधन के दाम नियंत्रित रखने के लिए सरकार, तेल कंपनियां और RBI उठा रहे हैं आर्थिक बोझ।
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कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम उसी अनुपात में नहीं बढ़े हैं। इसके पीछे केंद्र और राज्य सरकारों, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से किए जा रहे प्रयास हैं। हालांकि, तेल की ऊंची कीमतों का बोझ कम रखने की यह व्यवस्था सरकारी खजाने और सार्वजनिक क्षेत्र पर दबाव बढ़ा रही है। एक्सिस बैंक रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर पूरे साल कच्चे तेल की औसत कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो इस बोझ को संभालने के लिए कुल सहायता GDP के लगभग 1.7 फीसदी तक पहुंच सकती है।

कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से बढ़ा आयात बिल

रिपोर्ट के अनुसार, अगर खुदरा ईंधन की कीमतें स्थिर रखी जाती हैं, तो कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से संबंधित आर्थिक बोझ GDP के करीब 0.20 फीसदी तक बढ़ सकता है।

सितंबर में भारत का कच्चे तेल का आयात बिल सालाना आधार पर 46 फीसदी बढ़कर 15.4 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले साल इसी अवधि में 10.5 अरब डॉलर था। अप्रैल से सितंबर के बीच आयात बिल भी 61.9 अरब डॉलर से बढ़कर 90.6 अरब डॉलर पहुंच गया। रिपोर्ट में इसकी प्रमुख वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की ऊंची कीमतों को बताया गया है।

मध्य पूर्व में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास शिपिंग जोखिमों ने भी तेल की आपूर्ति और आयात लागत को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं।

सरकार, तेल कंपनियां और RBI उठा रहे बोझ

एक्सिस बैंक रिसर्च के अनुमान के मुताबिक, केंद्र सरकार की ओर से दी जा रही सहायता GDP के लगभग 0.8 फीसदी के बराबर है। इसमें पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती, उर्वरक सब्सिडी और घरेलू LPG से जुड़ी राहत शामिल हैं। अप्रैल से अगस्त के दौरान उर्वरक सब्सिडी में सालाना आधार पर 21 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

इसके अलावा, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों और राज्य सरकारों की सहायता GDP के लगभग 0.7 फीसदी के बराबर रहने का अनुमान है। इसमें तेल कंपनियों की ओर से ईंधन की ऊंची लागत का कुछ हिस्सा वहन करना और राज्यों के वैल्यू ऐडेड टैक्स (VAT) से जुड़े उपाय शामिल हैं।

रिपोर्ट में RBI का योगदान भी GDP के लगभग 0.2 फीसदी के बराबर आंका गया है। इसमें विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप और विदेशी मुद्रा स्वैप से जुड़ी व्यवस्थाओं का प्रभाव शामिल है।

कब तक मिलती रहेगी राहत?

रिपोर्ट के अनुसार, सोने पर शुल्क बढ़ाने, पेट्रोलियम उत्पादों पर अप्रत्याशित मुनाफे से जुड़े निर्यात शुल्क और इकोनॉमिक स्टेबलाइजेशन फंड जैसे उपायों से GDP के करीब 0.6 फीसदी के बराबर वित्तीय गुंजाइश बनाई जा सकती है। इससे वित्त वर्ष 2026-27 में राजकोषीय घाटे पर दबाव सीमित रखने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, राहत कितने समय तक जारी रह पाएगी, यह काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करेगा। यदि तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है, तो सरकार को सहायता कम करने या ईंधन की लागत का बड़ा हिस्सा उपभोक्ताओं तक पहुंचाने पर विचार करना पड़ सकता है।

इसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों, महंगाई और घरेलू खर्च पर पड़ सकता है। सरकार के सामने चुनौती उपभोक्ताओं को राहत देने और राजकोषीय स्थिरता बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने की होगी।

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